रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई आमजन को उपलब्ध होना विकास का मानक – सुनील बंसल

 
लखनऊ ।
भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री संगठन सुनील बंसल ने लखनऊ के पर्यटन भवन सभागार में आयोजित अवध क्षेत्र की संगोष्ठी लोकमत परिवार एवं लोकतंत्रिक प्रासंगिकता के उद्घाटन भाषण में कहा कि पं0 दीन दयाल के जन्मशताब्दी वर्ष में पंड़ित जी के समाज के बारे में, राजनीति के बारे में उनका अपना एक वैचारिक दर्शन था। जिन परिस्थितियों में पंड़ित जी ने जो बातें कही थी आज भी उनकी बाते उतनी ही प्रासंगिक हैं, उनके द्वारा कही गयी बातों पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है। मैं देख रहा हॅू देश के बहुत सारे विश्वविद्यालयों में उनके विचारों को लोग पढ़ भी रहे है समझ भी रहे हैं उस पर रिसर्च भी कर रहे है और उस पर नये-नये ढंग से उसकों प्रस्तुत करने का काम भी हो रहा है।
श्री बसंल ने कहा कि पं0 दीन दयाल जी को जितना पढ़ा है जितना समझा है विचार दिया, हर जन तक वो पहुंचे, समाज में सभी लोग उनके विचारों पर चर्चा करें बहस करें इस दृष्टि से इस संगोष्ठी का आयोजन हो रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जितने भी देश आजाद हुये उसमें से भारत एक है। आज हम देखेंगे कि जितने देशों ने लोकतंत्र को स्वीकार किया है उनके स्वस्थ्य लोकतंत्र दुनिया के किसी एक देश में है तो वह अपना देश भारत है।

श्री बंसल ने कहा कि अपने यहां इतने चुनाव होते है कि चुनाव की अधिकता के कारण कई बार इस लोकतंत्र की अच्छी बातों को अनुभूत कर पाते, गौरव नहीं कर पाते पूरे वर्ष भर देश में कही न कही चुनाव चलने के कारण से इसके उत्साह को कम अनुभव कर पाते हैं। लोकतंत्र होना चाहिए लोकतंत्र सबको अच्छा भी लगता हैं जहां लोकतंत्र नहीं है वहां के लोग इस बात को उठाते और इसके लिए आंदोलन भी करते रहते है। लोकतंत्र लोगों को अच्छा भी लगता है लेकिन कई बार लोकतंत्र को लेकर हम सबके मन कई प्रश्न भी खड़े होते है।

हमने यह मान लिया है कि लोकतंत्र का मतलब है वोट देना, वोट देकर सरकार चुनना, बाकी सभी काम, विकास के काम ये सरकार का काम हैं, वोट देने का काम हमारा है बाकी सब काम सरकार का है इसे बदलने की जरूरत है। इस देश के आम आदमी को एहसास कराना कि इस लोकतंत्र में सरकार मालिक नहीं है, बल्कि मालिक मतदाता है। राजनैतिक पार्टियों डेमोक्रेसी की मास्टर नहीं है, नेता लोग इस लोकतंत्र में हमारे मालिक नहीं हैं यह बात लोगों के मन में घर कर गई है कि लोकतंत्र का अर्थ सरकार है, लोकतंत्र का अर्थ पार्लिमामेंट है लोकतंत्र का अर्थ विधानसभा है लोकतंत्र का अर्थ पालिटिकल पार्टियां है सरकार है ये धारणा सबके मन में बैठ गयी है। वास्तव में ये सब डेमाक्रेसी के मास्टर नहीं है, इस देश का लोकतंत्र का मास्टर है इस देश का वोटर है। लोकतंत्र का मालिक वोटर है जैसा मतदाता होगा उसके मन से निकलने वाला लोकतंत्र भी वैसे ही होगा।
125 करोड़ की इस विभिन्नताओं वाले देश में एक वोटर का जैसा मन होगा उससे निकलने वाला लोकतंत्र भी वैसा ही होगा पं0 दीनदयाल जी का करते थे कि सिद्धान्त विहीन मतदान से सिद्धान्त विहीन राजनीति का जन्कम होता है अगर मतदान ही सिद्धान्त विहीन है, तो उससे पैदा होने वाली राजनीति भी सिद्धान्त विहीन होगी पंड़ित जी कहते थे कि मतदान यादे जाति के आधार मतदान यदि स्वार्थ के आधार पर होगें स्वार्थवंश मतदान यदि क्षेत्र के आधार पर हो क्षेत्रवादी होगा, मतदान यदि वंशवाद आधार पर सिद्धान्त विहीन होगा क्षेत्रवादी के आधार पर मतदान है तो उससे पैदा होने वाले लोकतंत्र लोकतंत्र या नेता कैसा सिद्धान्तवादी होगा, यदि हम वोट जाति के आधार पर दे रहे है तो नेता जातिवादी होगा और यदि हम स्वार्थ के कारण से अथवा अपने सम्बन्ध के कारण से मतदान करते है तो उससे पैदा होने वालाा लोकतंत्र स्वार्थी होगा। यदि पैसे के आधार पर खरीद कर नेता बनता है तो भ्रष्टाचार ही होगा।

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