नवरात्रि में लें संकल्प

‘अन्नो वै मन: के सन्देश को जीवन में अचरित करेंगे’
 
सुधांशु जी महाराज
वेद की सूक्ति है- ‘अन्नो वै मन:’ अर्थात् ‘जैसा खायें अन्न, वैसा बने मन’। जो भी अन्न हम खाते हैं, उसी अन्न के हिसाब से हमारा मन बनता है। यह अक्षरश: सत्य है। आश्विन नवरात्रि का दौर चल रहा है, मैं आपसे निवेदन करना चाहूँगा कि आप इस बात को गाँठ बाँध लीजिए।
जैसा खाएँगे अन्न, वैसा बनेगा मन’ का मतलब क्या है ? आप यह सवाल पूछिए। इसका सीधा सा अर्थ है कि जो भी अन्न आप खायेंगे, आपका शरीर उस अन्न को कई हिस्सों में विभक्त कर लेगा। कुछ हिस्सा हड्डियों को मज़बूती देने के लिए, कुछ चर्बी के लिए और कुछ भाग खून बनाने के लिए। आपके द्वारा लिए गये भोजन के ये अंश अपना-अपना काम करेंगे। कुछ भोजनांश वे होंगें, जो आपका स्वभाव बनाएँगे। यह बात आप सब लोग ख़ूब गहराई से समझ लीजिए।
इसीलिए आयुर्वेद का स्पष्ट नियम है और उसी प्राकृतिक नियम के अनुरूप सूक्ति रच दी गयी कि “जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन” और “जैसा पियो पानी, वैसी होगी वाणी”। मित्रों! बड़ा प्रभाव पड़ता है आपके द्वारा ग्रहण किए गये इस अन्न व पानी का। लोग इसकी गम्भीरता एवं महत्व को नहीं समझते और जहाँ भी-जो भी मिल गया, झट से खा लेते हैं अथवा पी लेते हैं।यह बात एक मनुष्य के लिए कत्तई ठीक नहीं।
इस बात को बड़ी गहराई में जाकर भगवान श्रीकृष्ण ने समझाया था कि यह मन बड़ा नटखट है। यह रजोगुण से उत्पन्न होता है और ये ज्ञानियों को भी ढक लेता है। उन्होंने कहा कि इंद्रियों से परे है तुम्हारा मन, मन से परे है बुद्धि और बुद्धि से भी आगे है तुम्हारी आत्मा। यह प्रभुवाणी है तथा एक शाश्वत सत्य है।
इस बात को स्वीकार लेने में ही सबका हित है कि इंद्रियों से महान मन, मन  से महान बुद्धि और बुद्धि से महान आत्मा है। इस क्रम के साथ आप अपने को नियंत्रित करो। इंद्रियों को पकड़ो मन के द्वारा। मन को पकड़ो बुद्धि के द्वारा, बुद्धि को ठीक करो आत्मा के द्वारा। ये प्रयोग प्रभु श्रीकृष्ण ने गीता में बताया। यशोदानन्दन ने मानव मात्र का आह्वान किया कि इस तरह से तुम अपने को संभालो, आगे बढ़ जाओ और इस मानव जीवन को सफल बना लो।

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