सुधांशु जी महाराज को सनातन हिन्दू युवा वाहिनी की दिल्ली शाखा ने ‘सनातन सन्त शिरोमणि सम्मान’ से नवाज़ा

 श्रद्धा पर्व महोत्सव पर विजामि संस्थापक हुए सम्मानित
बुजुर्ग सम्मान दिवस पर सुधांशु जी महाराज ने श्रद्धा पर्व का महत्व समझाया
आचार्य ने कहा- ‘बड़ों को सम्मान दें, वह तुम्हें स्नेह देंगे’
दिल्ली।
विश्व जागृति मिशन के संस्थापक-अध्यक्ष आचार्य सुधांशु जी महाराज को सनातन सन्त शिरोमणि सम्मान दिया गया है। यह सम्मान सनातन हिन्दू युवा वाहिनी द्वारा आचार्य श्री को प्रदान किया गया। इस अवसर पर देश की विभिन्न क्षेत्रों की अनेक प्रतिभायें उपस्थित रहीं। सनातन हिन्दू युवा वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उमाशंकर शर्मा, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष पुष्पेन्द्र मिश्र सहित वाहिनी के कई वरिष्ठ अधिकारी इस मौके पर उपस्थित रहे। अन्तरराष्ट्रीय कान्य कुब्ज ब्राह्मण महासंघ के अध्यक्ष डॉ0 विजय मिश्र भी इस अवसर पर उपस्थित थे। यह सम्मान श्रद्धा पर्व महोत्सव-2017 के अवसर पर दिया गया।श्रद्धा पर्व पर चर्चा करते हुए आचार्य सुधांशु जी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति आदर्शो की संस्कृति है। इस सनातन संस्कृति का आधारभूत तत्व है- श्रद्धा। श्रद्धा सम्मानास्पद व्यक्तियों के प्रति, देवों के प्रति, आदर्शों के प्रति, सत्य के प्रति, धर्म के प्रति, धर्मग्रन्थों के प्रति, गुरुजन के प्रति, समाज के प्रति, जन्मभूमि के प्रति, राष्ट्र के प्रति, विश्व मानवता के प्रति। श्रद्धा हमारा संस्कार है और यही है सर्वोत्कृष्ट धर्म भी एवं सवोत्तम कर्तव्य भी।
 
माता-पिता हैं सबसे बड़े देवता
जब बात श्रद्धा की अभिव्यक्ति की आती है, तब सबसे पहले स्थान पर आते हैं-हमारे बड़े व बुजुर्ग। इनमें भी जन्मदात्री ‘माँ’ और जनक ‘पिता’ का स्थान सबसे ऊपर बैठता है। इस सृष्टि में प्रथम पूज्य कहे जाने वाले गणपति भगवान गणेश द्वारा ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने की बात आने पर अपने माता-पिता ‘शिव-पार्वती’ की परिक्रमा करके उस परिक्रमा को ही सम्पूर्ण घोषित किये जाने का पौराणिक तथ्य इस बात को सही ठहराता है। किशोर बालक श्रवण कुमार द्वारा अपने माता-पिता की कांवड़ कंधे पर रखकर चारधाम यात्रा और उसी में अपने प्राणों का सवोच्च बलिदान कर देना माता-पिता को प्रथम गुरु व देव के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
 
आचार्यश्री ने कहा कि पितृ-वचन का पालन करने हेतु सम्मुख प्रस्तुत राज्यपद व ऐश्वर्य को क्षण भर में त्यागकर व 14 वर्ष बियाबान जंगल में बिताकर राजकुमार राम का युगों-युगों के लिए मयार्दा पुरुषोत्तम श्रीराम बन जाना तथा दो माताओं व दो पिताओं के प्रति अनोखे पुत्र-धर्म का निर्वहन कर देवकीनन्दन, यशोदानन्दन, वासुदेव एवं नन्दनन्दन बालक कन्हैया का परम यशस्वी गीतानायक श्रीकृष्ण बन जाना, यह दो इतिहास घटनायें विश्व जागृति मिशन के ‘श्रद्धापर्व’ के लिए अनुकरणीय उदाहरण हैं। आचार्यवर चाहते हैं कि आज की दुनिया के हर पुत्र एवं पुत्री को ऐसे महान उदाहरणों को अंगीकार करके माता-पिता का सम्मान कर स्वयं को महान बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भक्त पुण्डरीक की पितृ-सेवा को देखकर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें दर्शन देने की गाथा पण्ढरपुर नाम का तीर्थ आज भी गाता है। युवराज देवव्रत द्वारा अपने पिता के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेना तथा उसका दृढ़ता से पालन करना और लोक को ‘भीष्म-प्रतिज्ञा ‘ की उक्ति सदा-सदा के लिए देकर भीष्म पितामह के रूप में अमर हो जाना जनक-जननी के लिए सम्मान का अनूठा उदाहरण है। मातृभक्त
शिवाजी के जीवन के ढेरों उदाहरण तथा मातृसेवा से ही अकूत मान, सम्मान, राज-ऐश्वर्य सभी कुछ पा जाने की ऐतिहासिक घटना माता-पिता को उच्च पद पर आसीन करती है।
अनेक गुरुभक्तों द्वारा पितातुल्य गुरुदेव और मातृवत् गुरुमाता को सवोज़्च्च देव के रूप में प्रतिष्ठा के उदाहरण हृदय को माता-पिता के प्रति गहन-श्रद्धा से भर देते हैं। आदर्शों की सजीव प्रतिमा माँ शारदामणि, अरविन्द आश्रम की अधिष्ठात्री माताजी और लाखों-करोड़ों गायत्री साधकों की वन्दनीया माता भगवती देवी आध्यात्मिक आकाश में ध्रुवतारे की तरह अमर हो गयी हैं, जिन्हें ढेरों गुरुनिष्ठ आत्माओं ने आध्यात्मिक पिता गुरुवयज़् के साथ आध्यात्मिक माता का सवोज़्च्च सम्मान दिया।
 

बीस वर्षों में 200 से अधिक विभूतिवानों का हुआ है सम्मान

विश्व जागृति मिशन के महामंत्री देवराज कटारिया ने बताया कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के इस तरह के अनेक कीर्ति स्तम्भों से प्राप्त प्रेरणा तथा वर्तमान समय में माता व पिता सहित बड़े-बुजुर्गों की गम्भीर अवमानना की स्थितियों के बीच रामसेतु का काम किया है विश्व जागृति मिशन द्वारा वर्ष 1997 में आरम्भ किये गये श्रद्धापर्व ने। मिशन के कल्पनापुरुष आचार्य सुधांशु जी महाराज की प्रेरणा से आरम्भ हुआ श्रद्धा-पर्व हर साल 2 अक्टूबर को मुख्यालय आनन्द धाम सहित देश-विदेश में मनाया जाता है। समाजदेव को समर्पित लगभग 200 विशिष्टजनों को अब तक सम्मानित किया जा चुका है। इसके माध्यम से माता-पिता एवं बड़े-बुजुुर्गों के प्रति नयी पीढ़ी में सम्मान व सहकार की भावना तेजी से बढ़ रही है।

आँखों में आँसू भरे वृद्ध माता-पिता वृद्धाश्रम में रहें, कैसे सहन करे यह देश
विजामि के कोषाध्यक्ष राज कुमार अरोड़ा ने बीते बीस वर्षों की श्रद्धा पर्व महोत्सव यात्रा को याद करते हुए कहा कि माता-पिता एवं बड़े-बुजुर्गों के प्रति श्रद्धासिक्त हृदयों वाले भारत देश में माँ-बाप साधन-सम्पन्न पुत्र-पुत्रियों के होते हुए भी दु:खी हृदय से दूसरों की तरफ सहायता की चाहना की निगाह से देखें तथा उस समय उनकी आँखों में आत्म-पीड़ा के आँसू हों, इसे तपस्वी ऋ षियों-मुनियों का यह देश कैसे सहन कर सकता है? विश्व जागृति मिशन ने अनेक जीवन्त उदाहरण सामने लाते हुए देश की युवा पीढ़ी का ध्यान अपने माता-पिता व परिवार के वृद्धजनों की ओर खींचा है और उन्हें यथोचित सम्मान देने को कहा है।
जनरेशन गैप के दानव से पायें मुक्ति:

मिशन के निदेशक राम महेश मिश्र ने देशवासियों से अपील की कि जनेरेशन गैप के दानव सेत्रस्त इस देश व विश्व को नये रूप में गढऩे का एक गम्भीर अभियान चलाया जाए और आयु व सेवा दोनों से वरिष्ठ लोगों का मौलिक हक ‘आत्म सम्मान’ उन्हें वापस दिया जाए, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाए एवं आभार प्रकट किया जाए; तभी संस्कृति, समाज एवं समय की रक्षा हो सकेगी। बीती अद्र्धशती में बुजुर्गों एवं सुयोग्यों के असम्मान व तिरस्कार के रूप में राष्ट्र-विश्व पर छा गए कुहांसे को अभियानपूर्वक छांट डालने और इस बीच की पुरानी सड़ी-गली सोच एवं व्यवस्थाओं को बदल डालने का वक्त अब आ गया है।

 

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