कांग्रेस का हाथ, आतंक के साथ !

गुजरात चुनाव ने एक नई करवट ली है। बगदादी के आईएसआईएस आतंकी संगठन के एक आतंकी के कांग्रेस के कथित ‘चाणक्य’ अहमद पटेल के साथ संपर्कों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जिस ‘सरदार पटेल अस्पताल’ के साथ अहमद पटेल का 1979 से सीधा संबंध रहा है, उसमें आतंकी कासिम टिंबरवाला कैसे कर्मचारी बना ? उसका वेरिफिकेशन क्यों नहीं कराया गया ? अहमद भाई अस्पताल में ट्रस्टी थे और बाद में तत्कालीन राष्टपति प्रणब मुखर्जी और प्रख्यात कथावाचक मुरारी बापू के एक समारोह में मंच पर सक्रिय दिखे, तो कैसे यह दलील पच सकती है कि 2014 के बाद अस्पताल से अहमद भाई का नाता नहीं रहा ? सवाल तो यह होना चाहिए कि अस्पताल में आतंकी साजिशों की भनक ‘कांग्रेसी चाणक्य’ को क्यों नहीं लगी?

आतंकी यहूदियों के एक धर्मस्थल को उड़ाने की साजिश भी रच रहे थे। वे इस अस्पताल या किसी हिंदू धार्मिक स्थल को भी निशाना बना सकते थे! बहरहाल, अब सवाल-जवाब के दौरान बहुत कुछ सामने आ सकता है। दरअसल यह गौरतलब नहीं है कि अहमद पटेल कब तक अस्पताल में ट्रस्टी रहे थे और कासिम कब अस्पताल में लैब कर्मचारी बना। चूंकि अहमद भाई ट्रस्टी के पद से 2014 में इस्तीफा देने के बाद भी अस्पताल में सकिय रहे हैं। 23 अक्टूबर, 2016 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी गुजरात के प्रवास पर थे, तब अस्पताल में उस मौके पर अहमद भाई को किसने न्योता दिया था ? यह भी अहम सवाल है कि राष्ट्रपति को अस्पताल में आने के लिए किसने आग्रह और संपर्क किया था ?

दरअसल, अहमद पटेल ही उस समारोह के बुनियादी मेजबान थे। मुद्दा गुजरात में आईएस आतंकवाद का है। सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा का है। वैसे आतंकियों को संरक्षण देना, आतंकियों की मौत पर सोनिया गांधी के आंसू बहाना और अलकायदा के सरगना रहे लादेन को ‘ओसामा जी’ कहकर संबोधित करना कांग्रेस की संस्कृति और परंपरा रही है। लिहाजा गुजरात में आईएस आतंकियों के पर सोनिया-राहुल गांधी को सफाई देनी चाहिए। जिन्हें ‘गब्बर सिंह टैक्स’ पर चुटकी लेनी आती है, वे आतंकियों-कासिम और उबैद के सच को भी खंगाल कर दिखाएं। गुजरात एक अपेक्षाकृत शांत राज्य रहा है, लिहाजा गंभीर मुद्दा यह बन गया है कि गुजरात में भी इस्लामिक स्टेट के आतंकियों की दस्तक हो चुकी है। इन आतंकियों के गिरोह और स्लीपर सैल कितना फैल चुके होंगे, अब जांच के बाद कुछ सामने आ सकता है। कासिम और उसके साथी उबैद मिर्जा को गुजरात एटीएस ने गिरफ्त में ले लिया है। सवाल-जवाब में आतंकियों की साजिशों के सच बेनकाब हो सकते हैं। कितने नौजवानों को भरमा कर आईएस के इन एजेंटों ने सरगना बगदादी के पास भेजा होगा, शायद उसके भी खुलासे हो जाएं!

वैसे 2014 से ही केंद्र का गुप्तचर ब्यूरो (आईबी) इन आतंकियों का पीछा कर रहा था। संभव है कि फोन कॉल्स, फेसबुक, ट्विटर, इंटरनेट संवादों के भी खुलासे खुलें। इसी दौरान आईबी ने आशंका जताई है कि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर आतंकी हमला किया जा सकता है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के आधार पर वहां के कोस्टगार्ड ने पोरबंदर के समुद्र में भारतीय मछुआरों की चार नौकाएं पकड़ी हैं। भारतीयों के पहचान पत्र, दस्तावेज आदि भी छीन लिए गए हैं।
खुफिया सूत्रों को आशंका है कि 26/11 के हमले की तर्ज पर समुद्री रास्ते से घुसकर आतंकी हमारे नेताओं को निशाना बना सकते हैं, लिहाजा दोनों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है और उनके कार्यक्रमों और रास्ते को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। बहरहाल आतंकवाद, यदि, गुजरात चुनाव में मुख्य मुद्दे के तौर पर उभरता है, तो विकास का मुद्दा काफी पीछे छूट सकता है। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की जो समस्याएं उभर कर सामने आई थीं, उन पर विमर्श कम हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने पत्रकारों के संग दीपावली मिलन समारोह के मौके पर बतियाते हुए कहा-‘मैं गुजरात! मैं विकास हूं!’ वह इसे साबित करने के मूड में हैं, लेकिन अहमद पटेल और आईएस आतंकियों के समीकरणों का रहस्योद्घाटन गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने ही किया है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। कांग्रेसी दुष्प्रचार कर रहे हैं कि अहमद पटेल का राज्यसभा सांसदी से इस्तीफा इसलिए मांगा जा रहा है, क्योंकि उस चुनाव में हार से भाजपा खीझ की मनोदशा में है। ऐसी दलीलों से आतंकवाद सरीखे मुद्दों पर ढक्कन नहीं डाला जा सकता। केंद्र और गुजरात सरकार की खुफिया एजेंसियां मिल कर गहन जांच-पड़ताल करें। जो भी निष्कर्ष सामने आता है, उसे सार्वजनिक कर कार्रवाई करें।

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