राहुल गांधी ‘पीडी’ प्रयोग !

जब दुनिया में सोशल मीडिया की औपचारिक शुरुआत हुई थी, तो उसका एक मकसद था। कुछ सोशल नेटवर्किंग साइट्स अमरीका के बाजार को व्यापारियों से जोड़ने के मद्देनजर तैयार की गईं, तो कुछ को मित्रों, परिजनों और सहपाठियों के बीच संवाद सेतु के तौर पर गढ़ा गया। कुछ वेबसाइट्स समलैंगिक लोगों के लिए भी थीं, क्योंकि अमरीकी समाज इस प्रवृत्ति को स्वीकृति दे चुका है। युवा चेहरे आपस में ‘डेटिंग’ कर सकें और अंततः अपना जीवनसाथी भी चुन सकें, इसकी भी वेबसाइट्स रची गईं, लेकिन जब कुछ हदें लांघी जाने लगीं, तो पाबंदियां थोपने में भी देर नहीं लगी। कुल मिलाकर, सोशल मीडिया को ‘बेमानी’ नहीं माना गया। यह वर्ष 2000 से कुछ पहले के दशक की हकीकत है, लेकिन भारत में सोशल मीडिया कितना विदू्रप, अश्लील, अभद्र और गैर जिम्मेदार है, इसका उदाहरण सिर्फ इसी तथ्य से मिल जाता है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर एक संविधान पीठ का गठन करना पड़ा है। हमने बीते दिनों भी सोशल मीडिया का विश्लेषण किया था, लेकिन आज उसका संदर्भ कुछ अलग है। हिमाचल और गुजरात में चुनावी मौसम है, लिहाजा वार-पलटवार, आरोप-प्रत्यारोप की जंग जारी है। इस दौरान कांग्रेस ने लगातार प्रचारित किया है कि पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो रहे हैं। वह प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को उन्हीं के अस्त्र से पराजित करना चाहते हैं। लिहाजा सोशल मीडिया पर राहुल को देखने और पढ़ने की जिज्ञासा स्वाभाविक ही थी। सामने एक चित्र आया, जिसमें राहुल गांधी अपने पालतू कुत्ते ‘पीडी’ को कह रहे हैं-नमस्ते करो। फिर एक कागज को पीडी की नाक पर रखकर वह कह रहे हैं-इसे पकड़े रहो। चूंकि कुत्ता तो प्रवृत्ति से ही ‘स्वामीभक्त’ होता है, लिहाजा जब ‘पीडी’ भी आदेशों का पालन करता है, तो उसे गुडबॉय या शाबाशी मिलती है। सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी सोशल मीडिया का किस तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल यह है कि विपक्ष के जिस चेहरे ने गुजरात में प्रचार कर प्रधानमंत्री मोदी को रक्षात्मक बना दिया हो, भाजपा को रणनीति बदलने को बाध्य किया हो, क्या वह जीएसटी और नोटबंदी के बजाय ‘पालतू कुत्ते’ को सोशल मीडिया का विषय बनाएगा? सवाल राहुल गांधी की व्यक्तिगत गंभीरता और राजनीतिक परिपक्वता का भी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में भी ‘पीडी’ पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच में गोलमेज पर बैठा दिखाया गया है। राहुल ऐसे चित्रों के जरिए देश को क्या संदेश देना चाहते हैं? कांग्रेस यह हास्यास्पद सफाई दे रही है कि राहुल गांधी खुद ट्वीट लिखते हैं। उनमें व्यंग्य का पुट भी होता है, लेकिन सवाल तो यह है कि कुत्ते वाले ट्वीट में हास्य-बोध कहां है? अभी तो पार्टी को शुक्र मनाना चाहिए कि सोशल मीडिया भारत में फिलहाल एक संभ्रांत जमात तक ही सीमित है। यदि राहुल के इस प्रयोग को ग्रामीण जनता के सामने रखा जाए, तो कांग्रेस के प्रति उसकी राय कैसी होगी? शायद राहुल गांधी इस सवाल की गहराई को नहीं जानते! लेकिन यह नकारात्मक ब्रांडिंग का प्रयोग है। बेशक राहुल विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं, लिहाजा लोकतंत्र में विपक्ष का चेहरा उन्हें ही पेश किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी की तुलना में भी राहुल को ही ‘मुकाबलेदार’ माना जाएगा, लेकिन सोशल मीडिया के संदर्भ में आकलन करें, तो अब भी राहुल गांधी प्रधानमंत्री की तुलना में कहीं नहीं ठहरते। सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के 3.60 करोड़ फॉलोअर्स हैं, जबकि राहुल के हिस्से करीब 40 लाख ही हैं। सोशल मीडिया पर भाजपा के पक्षधर करीब 63 लाख हैं, जबकि कांग्रेस के करीब 24 लाख हैं। नतीजतन देश की राजनीति में फिलहाल सर्वोच्च ब्रांड प्रधानमंत्री मोदी ही हैं। दुर्भाग्य है कि चुनावों के दौरान भी सोशल मीडिया पर कोई गंभीर मुद्दा नहीं है। वैसे राहुल गांधी लगातार बोल रहे हैं कि जीएसटी और नोटबंदी दो ऐसे ‘तारपीडो’ हैं, जो मोदी सरकार ने जनता पर चलाए हैं। यदि इन्हीं मुद्दों पर राहुल गांधी सोशल मीडिया पर भी व्यंग्य करते दिखते, तो जनता उस भाव को स्वीकार कर सकती थी। एक कुत्ता चुनाव कभी भी नहीं जिता सकता। ऐसा तो अमरीका, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन सरीखे विकसित देशों में भी नहीं देखा गया। राहुल गांधी हिंदी फिल्मों के किरदार सरीखे लगते रहे हैं। सवाल है कि आखिर देश की चिंता कौन करेगा? यह विपक्ष की रचनात्मक नहीं, मजाकिया भूमिका है।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *