धर्म परिवर्तन की धमकी में कितना दम

बसपा सुप्रीमो मायावती अपनी बेतुकी कार्यशैली के कारण जनमानस में विश्वसनीयता खो चुकी हैं। इसलिए जब वे क्रान्तिकारी मुद्रा अपनाती हैं तो लोगों को हास्यास्पद नजर आने लगती हैं। आजमगढ़ में पार्टी की चार मण्डलों की रैली में उन्होंने नए तेवर दिखाए। धमकी दी कि दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के प्रति भाजपा ने अपनी सोच नहीं बदली तो वे धर्म परिवर्तन करके बौद्ध बन जाएंगी। उन्हें उम्मीद रही होगी कि उनकी इस घोषणा से राजनैतिक हल्कों में भारी खलबली पैदा हो जाएगी और भाजपा त्राहिमाम जैसी गत पर जा पहुंचेगी। लेकिन सही बात यह है कि कोई भी उनकी इस धमकी को अच्छी तरह से नोटिस तक नहीं कर रहा। उनके लोगों के लिए इस मामले में उनकी करतूत को लेकर नए रहस्योद्घाटन जैसी प्रतिक्रिया है जो उन पर भारी पड़ सकती है। स्वयं मायावती ने पहले कई बार आभास कराया है और मानकर भी चल रहे हैं कि मायावती तो कभी की बौद्ध धर्म की दीक्षा ले चुकी होंगी। लेकिन बहनजी ने तो अपनी ही पोल खोल दी कि वे अभी तक हिन्दू हैं। यह मिशन कि साथ उनके छल जैसी स्वीकारोक्ति का प्रभाव दे रहा है। कांशीराम द्वारा चलाए गए मिशन में उच्च पदाधिकारियों के लिए बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण करना अघोषित अनिवार्यता की तरह माना गया था। क्योंकि बाबा साहब अंबेडकर अपने जीवन के अन्तिम समय में न केवल स्वयं बौद्ध हो गए थे बल्कि सभी दलितों को सामाजिक गुलामी से मुक्ति के लिए इसी रास्ते पर आगे बढ़ने को निर्देशित भी कर गए थे।

मायावती कांशीराम के सुयोग्य उत्तराधिकारी के बतौर अंबेडकरवाद की दुहाई तो बहुत देतीं हैं, लेकिन लगता यह है कि उन्होंने अंबेडकरवाद का ककहरा तक नहीं पढ़ा है। बाबा साहब ने नए समाज को तैयार करने के लिए दलित समाज को संदेश दिया था कि सारी अनुसूचित जातियंा अपनी पहचान मिटाकर बौद्ध पहचान में एकसूत्र हो जाएं। उनकी मंशा थी कि दलित अपनी इस लीक के अनुसरण के लिए शेष बहुजन को भी सहमत करें। इस तरह जाति विहीन समाज के निर्माण की नींव रखकर वर्ण व्यवस्था के किले को ध्वस्त करने के लिए उस पर अचूक प्रहार किया जाए। लेकिन मायावती ने नेता के रूप में स्थापित होने के बाद, इसका मतलब है कि जब वे लोगों को प्रेरित करने वाले केन्द्र के रूप में पूरी तरह उभर गईं तो उन्होंने यह जिम्मेदारी निभाने की वजाय जातिगत पहचानों को नए सिरे से मजबूती दी। उन्होंने बसपा में जाति के आधार पर भाईचारा समितियां बनवाईं जिससे समाज के जातिगत विभाजन को नए सिरे से बढ़ावा मिला। बाबा साहब कहते थे कि वर्ण व्यवस्था सोपानवत है दबे कुचले समाज में जातिगत पहचानें जहर घोलने का काम करती हैं। हर जाति को लगता है कि वह किसी न किसी दूसरी जाति से ऊचे सोपान पर है। इससे श्रेष्ठता का काल्पनिक सुख उनमें भरता है जो उन्हें जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ने से रोकता है और वे अपने साथ हुए अन्याय व उत्पीड़न की मुख्य कारक इस व्यवस्था को मिटाने की वजाय इसे सीचने में लग जाते हैं। बसपा मेें जातिगत भाईचारा समितियों की सोच बाबा साहब की इस अवधारणा को मिट्टी में मिलाने वाली रही है।

सामाजिक उपनिवेशवाद को धार्मिक व्यवस्था के नाम से कायम किया गया। जिसमें दलितों में दोयम् दर्जे की स्थिति स्वीकार कराने की भावना ध्वनित है। इसे किसी भी रूप में मान्यता देना बहुजन समाज के लिए अपने स्वाभिमान कोे झुठलाने जैसा है। कांशीराम ने अपने मिशन की शुरुआत इसके खिलाफ जागरण के बतौर की थी। लेकिन मायावती ने इस मामले में ढुलमुल रवैया अपनाया, जिसका नतीजा है कि आज ओबीसी तो लगभग शत प्रतिशत धार्मिक पुनरुत्थान के ज्वार में आप्लावित हो चुका है। दलितों में भी इसे लेकर कम आकर्षण नहीं है। मायावती की पार्टी के टिकट पर सांसद, विधायक निर्वाचित होने वाले दलित तक उन आडंबरों में उलझे रहते हैं। जिनका सक्षम बन जाने पर उन्हें पूरी दृढ़ता से प्रतिकार करना चाहिए था। उन्हें यह भान नहीं रहा कि उधार के तिलक और जनेऊ से वे अपने मान-सम्मान को बेचने में लगे हैं। क्योंकि जो ग्रंथ इनका विधान करते हैं, उनके लिए यह कर्मकांड विभेदीकरण का चिन्ह है। बहुजन समाज की जातियों को जिन्हें धारण करना निषिद्ध किया गया है। ताकि वे हमेशा ग्लानि की भावना से दबी रहें। लेकिन मायावती ने इससे कभी सरोकार नहीं रखा कि वे देखतीं कि उनकी कौम में किस कदर धर्म के नाम पर आत्मघाती सन्निपात हो रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में तो कहा गया था कि दलितों सहित पूरे बहुजन को पता था कि बहनजी तो प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर हैं इसलिए राष्ट्रवाद के नाम पर उन्होंने बसपा की अनदेखी भारतीय जनता पार्टी को जिताने के लिए कर दी। लेकिन यूपी के विधानसभा चुनाव में तो यह विपर्यास और गहनता के साथ घटित हुआ लालू यादव आर्थिक घोटाले में तो लिप्त हो सकते हैं लेकिन सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता में कभी गफलत करना उन्होंने गवारा नहीं किया जिससे बिहार विधानसभा के गत चुनाव में उनके सामने मोदी के जादू की एक न चल सकी। दूसरी ओर यूपी में मायावती का असर मिट्टी के किले की तरह भुरभुरा साबित हो गया। 2014 के लेाकसभा चुनाव में मायावती की बिरादरी तक के वोट भाजपा के खाते में चले गए। क्या यह बात आदरणीय जान नहीं सकी थीं।

मायावती हैं कि इसके बावजूद सबक नहीं सीखना चाहतीं। लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने विपक्ष के साथ सामूहिक गोलबंदी में अपने को भी जोड़ने की ललक प्रदर्शित की थी। लेकिन बाद में वे विपक्षी बिरादरी से कटने लगीं। अखिलेश यादव इसी को भांपकर कहते हैं कि कांग्रेस और उनकी दोस्ती तो पक्की है पर बुआजी के बारे में पूछो तो वे डाट-डाट करके बात टाल जाते हैं। कांग्रेस की भी कमोवेश मायावती को लेकर ऐसी ही धारणा है। निष्पक्ष विश्लेषक भी महसूस करने लगे हैं कि मायावती ने हाल में अजीबोगरीब मानसिकता दिखाई है। जिससे लगता है कि अन्दर ही अन्दर उनकी भाजपा के साथ कोई खिचड़ी पक रही है। जिसकी वजह से भाजपा के खिलाफ विपक्ष को ताकत न देना उनकी नियति बन गया है। भाजपा के साथ उनकी दुरभि संधि के इन संदेहों के बीच मायावती ने आजमगढ़ में उसके प्रति कटु बयानबाजी की है। क्या इसलिए कि वे इन संदेहों को कुंद करना चाहती हैं या उनकी दहाड़ भाजपा द्वारा ही दिशा निर्देशित एक पैतरा है। भाजपा शायद सोचती है कि अगर मायावती की पार्टी का वजूद बना रहेगा तो वे उसका विरोधी वोटों का एक बड़ा प्रतिशत अपने पाले में खीचकर बर्बाद करने में सहायक बनी रहेंगी। इसलिए आश्चर्य नहीं कि मायावती की धर्म परिवर्तन की बन्दर भभकी के पीछे भाजपा का ही हाथ हो, ताकि निकाय चुनाव में बसपा की वोट खीचने की ताकत बढ़े। बताने की जरूरत नहीं कि इससे सपा को भारी होगा जिससे भाजपा अपना मुख्य मुकाबला मानती है। वैसे भी, मायावती का वोटर भाजपा के निशान पर तो ईवीएम का बटन दबाने को रहा। बल्कि वह भाजपा को हराने के नाम पर छुट्टा छोड़े जाने की स्थिति में सपा का साथ दे सकता है। वैसे भी दलितों द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण करने से भाजपा के विचलित होने का सवाल नहीं है क्योंकि सनातन धर्म ने अपनी भी एक शाखा के रूप में बौद्ध धर्म को अपने में मर्ज करने का इंतजाम बहुत समय पहले से कर रखा है। इसलिए मायावती द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने की घोषणा का उनका साथ दे रहे दूसरे धर्मावलंबियों पर उल्टा असर हो सकता है। हो सकता है वे सोचने लगे कि मायावती को धर्म परिवर्तन करना ही है तो उनके धर्म में आने की क्यों नहीं सोचना चाहिए। क्या उनके धर्म से मायावती को कोई एलर्जी है। अंत में भाजपा सुधरे या न सुधरे लेकिन मायावती को तो चाहिए कि वे फौरन बौद्ध धर्म की दीक्षा ले लें, ताकि अग्रणी अंबेडकरवादी होने की अर्हता पूरी कर सकें

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