जातीय नेताओं पर जोर!

चुनावी कारणों से जातीय नेताओं को महत्व देने की राजनीति अवांछित है। क्या गुजरात के अनुभव से सबक लेकर दूसरे राज्यों में भी जातीय गोलबंदी को बढ़ावा नहीं मिलेगा? अपने देश में चुनावों के समय जातीय आधार रखने वाले नेताओं की पूछ- परख किस तरह बढ़ जाती है, इसकी मिसाल फिलहाल गुजरात में देखने को मिल रही है। पिछले दो साल के अंदर इस राज्य में अलग-अलग जाति-समूहों में आधार रखने वाले तीन युवा नेताओं का उदय हुआ। अब जबकि विधानसभा चुनाव की बिसात सज रही है, तो राजनीतिक पार्टियां उन्हें अपनी ओर खींचने की होड़ में जुटी दिखती हैं। कांग्रेस के लिए ये काम अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि इन तीनों नेताओं ने प्रदेश एवं केंद्र की सरकारों के खिलाफ लामबंदी करते हुए अपनी सियासी हैसियत बनाई है। तीनों नेताओं ने जो भावनात्मक मांगें उठाईं, उनमें तीखा विरोधाभास है। इसके बावजूद हैरतअंगेज है कि भाजपा विरोधी अपनी मानसिकता के कारण वे कांग्रेस की ओर झुकते दिख रहे हैं। अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की गोलबंदी करने वाले अल्पेश ठाकोर ने तो बाकायदा कांग्रेस में शामिल होने का एलान कर दिया है। पूरी संभावना है कि वे इस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। क्या पाटीदार समुदाय के लिए आरक्षण आंदोलन का नेतृत्व करने वाले हार्दिक पटेल और दलित नेता जिग्नेश मेवानी भी उनकी राह पर चलेंगे, यह अभी साफ नहीं है। मेवानी ने कहा है कि चुनाव लड़े या नहीं, यह वे अपने साथियों के साथ बैठक के बाद तय करेंगे। पटेल ने हालांकि अभी तक चुनाव से दूर रहने की बात ही कही है, लेकिन यह भी साफ किया है कि इस वक्त उनकी प्राथमिकता भाजपा को हराना है। अब इन तीनों नेताओं के एजेंडे पर गौर करें। हार्दिक की मांग है कि पाटीदार समुदाय को ओबीसी घोषित कर आरक्षण दिया जाए। अल्पेश मौजूदा ओबीसी जातियों को मिल रहे आरक्षण को किसी और से साझा करने के सख्त खिलाफ हैं। पाटीदार दबंग समुदाय है, जिसका दलित और ओबीसी जातियों से पहले से सामाजिक अंतर्विरोध रहा है। ओबीसी और दलित जातियों की टकराहट भी अक्सर जाहिर होती रहती है।
तो अहम सवाल यही है कि इन तीनों नेताओं को कांग्रेस कैसे संतुष्ट करेगी ? सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत आरक्षण पचास फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। इसका आखिर क्या समाधान उसके पास है ? बिना यह जाने इस पार्टी की तरफ इन युवा नेताओं का झुकना क्या यह संकेत नहीं देता कि वे अपने उद्देश्य के प्रति अगंभीर हैं? संभवत: इसी कारण हार्दिक के नेतृत्व वाली पाटीदार अनामत आंदोलन समिति में फूट पड़ गई है। उसके दो प्रमुख नेता (वरुण पटेल और रेशमा पटेल) भाजपा में शामिल हो गए हैं।
बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर अधिक गहराई से सोचने की जरूरत है। चुनावी कारणों से जातीय नेताओं को महत्व देने की सियासत पर अब सवाल उठाए जाने चाहिए। क्या गुजरात के अनुभव से सबक लेकर दूसरे राज्यों में भी जातीय गोलबंदी को बढ़ावा नहीं मिलेगा? क्या इससे यह संदेश नहीं जाता कि जज्बाती या भडक़ाऊ मांगों को उठाकर जाति विशेष में अपना आधार बना लेना राजनीति में प्रवेश का सफल फॉर्मूला है? कांग्रेस की चुनाव जीतने की बेसब्री समझ में आती है। लेकिन इसके लिए गुजरात में उसने जो रास्ता चुना है, वह अवांछित है।

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