भूल जाइए पुराने अखिलेश को, नये अखिलेश में दिख रहा है नया जोश

आशीष वशिष्ठ

2012 के उस अखिलेश को भूल जाइए जो मायावती की सरकार के हाथी को पलटने के लिये पूरे यूपी को नाप रहा था। उस अखिलेश को भी भूल जाइए जिसने मार्च 2012 में 39 साल की उम्र में देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री पद की कसम ली थी। उस अखिलेश को भी भूल जाइए जिसने पांच साल तक अपने पिता, चाचा और अंकलों की छत्रछाया में मुख्यमंत्री बनकर राज किया। उस अखिलेश को भी भूल जाइए जिसने बीती जनवरी में अपने पिता को हटाकर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का ताज अपने माथे से बांध लिया। उस अखिलेश को भी भूल जाइए जिसने किसी जमाने में अपने सबसे प्रिय चाचा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था। उस अखिलेश को भी भूल जाइए जिसने कांग्रेस के साथ यूपी विधानसभा के चुनाव लड़ने का फैसला लिया। उस अखिलेश को भी भूल जाइए जो यूपी की सत्ता गंवा बैठा। बस याद रखिए तो उस अखिलेश को जिसे ताजनगरी आगरा के तारघर मैदान में पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में निर्विरोध पांच साल के लिये पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है। 

अठारह साल से राजनीति में सक्रिय ओर पांच साल यूपी का मुख्यमंत्री रहने के बावजूद अखिलेश का समय और इम्तिहान अब शुरू होता है। जब वो अपनी पार्टी के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं। अब उनकी ही अगुवाई में पार्टी 2019 का लोकसभा और 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ेगी। अखिलेश का दावा है कि पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त है। पार्टी के कई नेता जो उनके पिता के पुराने और पक्के साथी हैं, अखिलेश के साथ हैं। अखिलेश के दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का ऐतिहासिक दृश्य देखने के लिये उनके पिता और चाचा मंच पर मौजूद नहीं थे, लेकिन अखिलेश ने जिस राह को चुना है वो पथरीली और कांटों से भरी है।
विधानसभा चुनाव से पूर्व और नतीजे आने के बाद समाजवादी पार्टी और परिवार में काफी कुछ बदल गया है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता दूसरे दलों में शामिल हो गये हैं। कुछ ने घर बैठना स्वीकार किया है। तो कहीं नेताजी और शिवपाल सिंह के बीच झूल रहे हैं। इन सबके बीच अखिलेश अपनी टीम के साथ वर्तमान और भविष्य की राजनीति की रूपरेखा तैयार करने में जुटे हैं।
काबिलेगौर है कि अपने पांच साल के कार्यकाल में अखिलेश की युवा टीम सरकार और पार्टी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गयी। समाजवादी कुनबे और पार्टी की वर्तमान गतिविधियों पर नजर डालें तो ऐसा आभास होता है कि अखिलेश काफी पहले से ही इन सब तैयारियों में जुटे थे। हां वो अलग बात है कि राजनीतिक पंडित और पार्टी के वरिष्ठ नेता इसका अंदाजा नहीं लगा पाये। मुलायम सिंह यादव पार्टी के संरक्षक हैं। उनके कई खास साथी मसलन आजम खां, रामजी लाल सुमन आदि अखिलेश के साथ खड़े हैं। ऐसा लगता है नेताजी ने अखिलेश को पार्टी सौंपकर अघोषित संन्यास ले लिया है। अगर यह कहा जाए कि समाजवादी पार्टी में अब मुलायम युग की जगह अखिलेश युग की शुरूआत हो गयी है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश की अगुवाई में सपा ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। 224 विधायकों के साथ अखिलेश ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी। 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा के वोट बैंक में सेंध लगी। परिवार के पांच सदस्य छोड़कर कोई दूसरा सपा प्रत्याशी संसद की चौखट लांघ नहीं पाया। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ने लोकसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन जारी रखा और सत्ता से बाहर हो गयी।
आज सपा के मतलब अखिलेश और अखिलेश का मतलब सपा है। चुनौतियों का पहाड़ सामने है। केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार है। भाजपा ने सपा को 2012 में मिली जीत से काफी बड़ी जीत दर्ज की है। लगभग 50 फीसदी वोटर उसके साथ खड़े हैं। अपने परंपरगत वोट बैंक के साथ भाजपा सपा के पिछड़े वर्ग के वोट बैंक में लगातार सेंधमारी कर रही है। राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि सही मायने में अखिलेश यादव की अग्निपरीक्षा अब शुरु होगी क्योंकि भाजपा से लड़कर पार्टी को फिर से सत्ता में लाना उनके लिये कठिन चुनौती होगी। बसपा की नजर भी सपा के वोट बैंक पर है। विधानसभा चुनाव में जिस कांग्रेस के साथ अखिलेश ने हाथ मिलाया था, वो देशभर में लगातार कमजोर हो रही है। ऐसे में अखिलेश भाजपा की चुनौती का सामना कैसे करेंगे, ये देखना दीगर होगा।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भाजपा भी अन्य दलों की भांति राजनीतिक प्रपंच और हथकंडे सीख चुकी है। अब वो इन हथकंडों का अपने पक्ष में जमकर इस्तेमाल भी कर रही है। एक चुनाव जीतते ही वो अगले चुनाव की तैयारियों में जुट जाती है। प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया में भाजपा ने अपना प्रभुत्व कायम कर रखा है। सोशल मीडिया पर कार्यकर्ताओं की लंबी फौज विरोधी विचारधारा के दांत खट्टे करने के लिये चौबीस घंटे मुस्तैद है। सपा आज सत्ता से बाहर है। उसको न तो सरकारी मशीनरी का सहयोग है। सपा के पास भाजपा की आक्रामक चुनावी रणनीति का मुकाबला करने के साधन और संसाधन हैं। सोशल मीडिया पर सपा कार्यकर्ता सक्रिय हैं लेकिन उसको और मजबूत करने की जरूरत दिखाई देती है।
पार्टी के चंद वरिष्ठ नेताओं के अलावा ज्यादातर सक्रिय नहीं हैं। वहीं तमाम वरिष्ठ नेताओं व कार्यकर्ताओं का अखिलेश की युवा टीम से तालमेल और संवाद भी बेहतर नहीं है। नये व पुराने नेताओं व कार्यकर्ताओं की कार्यशैली भी काफी अलग है। असल में पुराने व वरिष्ठ नेता नयी टीम के साथ कदमताल करने में सहज महसूस नहीं करते हैं। वहीं रही सही कसर परिवार और पार्टी में मचे घमासान ने पूरी कर दी। पार्टी में वर्चस्व को लेकर जो घमासान विक्रमादित्य और कालीदास मार्ग पर मचा, उसका लंबा खामियाज समाजवादियों को भुगतना पड़ेगा। वर्चस्व की इस लड़ाई ने नेताओं और कार्यकर्ताओं का सपा की बजाय नेता विशेष का कार्यकर्ता व समर्थक बना डाला। अखिलेश के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है कि साइकिल को अपना चुनाव चिह्न मानने वाले और सिर पर लाल टोपी लगाकर समाजवाद का नारा बुलंद करने वालों को ‘केवल समाजवादी’ बनाकर एक झण्डे के नीचे ला पायें। अगर अखिलेश यह करने में सफल रहे तो वो समाजवादी और अपने पिता एवं वरिष्ठ नेताओं की विरासत को सहेजते हुये देश के बड़े नेता के तौर पर उभरेंगे।
ऊपरी तौर पर भले ही ऐसा आभास हो रहा हो कि अखिलेश के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही पिछले 15 महीने से पार्टी व परिवार में चल रही उठापटक, खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई खत्म हो गयी है। यह सोच किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। चाचा शिवपाल सिंह पार्टी में रहते हुये और उसका साथ छोड़ने की दोनों स्थितियों में नुकसान करने की हैसियत में हैं। समजावादी कुनबे के सदस्यों के मन-मस्तिष्क में क्या चल रहा है, इसका तो मात्र अंदाजा ही लगाया जा सकता है। एक बात सच है कि अगर परिवार की कलह पर जल्द ही ब्रेक न लगा तो अखिलेश को एक साथ बाहरी व घरेलू दोनों मोर्चों पर जूझना होगा।
अखिलेश विनम्र, सौम्य व मिलनसार हैं। युवाओं में उनका क्रेज है। उनके पास बतौर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पांच साल का अनुभव भी है। अखिलेश के साथ अपनी मनमुताबिक टीम भी है। इन तमाम सकारात्मक बातों के साथ जमीनी सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब अखिलेश अपने निर्णयों और नीतियों की जिम्मेदारी पिता और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर नहीं थोप सकते हैं। अब बागडोर उनके हाथ में है। अखिलेश को यह याद रखना होगा कि समाजवादी पार्टी ने उनके पिता मुलायम सिंह के नेतृत्व में चार बार उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल की है। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव पार्टी को कितनी ऊंचाई तक ले जा पाते हैं।

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