योगी की अयोध्या

त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास और रावण वध के बाद अयोध्या वापस लौटे थे, तब जोरदार रोशनी से उनका स्वागत किया गया था। पूरे अयोध्या को दीयों की रोशनी से जगमग किया गया था। ऐसा कलयुग में पहली बार इस साल अयोध्या में ऐसी दीपावली मनीं, जिसमें एक साथ लाखों दीये जगमगा उठे। पूरी अयोध्या राममय हो उठी। एक बार तो ऐसा लगा जैसे अयोध्या में सही मायने में राम राज्य आ गया है। इस आयोजन में सभी धर्मों की साझेदारी देखने को मिली। हालांकि भगवान राम की अयोध्या इस बार योगी आदित्यनाथ की अयोध्या अधिक लगी।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में सरयू तट के किनारे भगवान श्री राम का राजतिलक किया। अयोध्या की दिव्य दिवाली के बीच सरयू नदी के तट को पौने दो दीयों से रोशन करने के साथ ही अद्भुत लेजर लाइट शो के जरिये रामलीला दिखाई गई। वहीं, प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अयोध्या के संतों ने हैरिटेज वॉक के जरिये अयोध्या की संस्कृति और परंपरा को बेहद करीब से देखा। दिवाली समारोह में तब का दृश्य बेहद भावनात्मक और रोमांचक कर देने वाला था जब राम की शोभा यात्रा की अगुवाई एक ही परिवार के 5 मुस्लिम भाई कर रहे थे। लोग इनके पांव छू रहे थे, इनके सामने हाथ जोड़ रहे थे और इन पर फूलों की वर्षा कर रहे थे। यहां के लोगों का कहना था की अयोध्या में ऐसा दृश्य पहली बार देखने को मिला। हालांकि विपक्ष को यह सब नागवार गुजरा है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में सरकार जिस तरह से धार्मिक प्रपंच का सहारा ले रही है उससे बुनियादी मुद्दे पूरी तरह से हाशिये पर हैं। अयोध्या में दीपावली पूजन, चित्रकूट में मंदाकिनी नदी की आरती, आगरा में ताज महल का विवाद, कांवर यात्रा पर फूल वर्षा, धार्मिक शहरों को प्रमुख पर्यटन क्षेत्र के रूप में प्रचार करना और मुख्यमंत्री के सरकारी आवास को गंगा जल से पवित्र कराना कुछ ऐसे प्रपंच हैं जिनका प्रचार ज्यादा हो रहा है। सरकार इन मुद्दों पर भी केवल बातें ही कर रही है। वहां विकास की किसी भी योजना को लेकर मूलभूत काम नहीं हो रहा है। बसपा सुप्रीमों मायावती कहती हैं कि अगर अयोध्या की बात करें तो वहां के खर्च के संबंध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदियनाथ का कहना है कि अयोध्या का खर्च संत महात्माओं ने किया। सरकार ने कोई खर्च नहीं किया। यह बात किसी के गले उतरने वाली नहीं है। विपक्ष की बातों के परिपेक्ष्य में देखें तो किसी भी शहर में सडक़, बिजली, पानी का इंतजाम करना ही वहां का विकास करना नहीं होता है। लोगों को रोजगार मिले, बेरोजगारी कम हो, लोग काम धंधे में लगें, इससे ही समाज में अमन चैन आता है। सडक़ें कितनी ही अच्छी बन जायें, अगर रोजगार नहीं होगा तो लोग अपराध करेंगे। अयोध्या का सच दीवाली के दिन नहीं दिखा। आयोजन की भव्य चकाचौंध में वह सच कहीं खो गया था। अयोध्या का सच दीवाली की अगली सुबह दिखा जब बच्चे घर में सब्जी बनाने के लिये जलाये गये दीयों में बचे तेल को एक जगह एकत्र कर रहे थे। असल में तो दीवाली की सुबह तो अयोध्या में रामराज होना चाहिये था। जहां किसी को कोई कष्ट नहीं होता। रामराज की असल परिकल्पना तभी सच हो सकती है। जब समाज का अंतिम आदमी खुशहाल नजर आये। भाजपा संस्थापक रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंत्योदय की परिकल्पना में भी समाज का वहीं अंतिम आदमी था। वह उसको ही खुशहाल बनाने का काम कर रहे थे। आज अंतिम आदमी का सच दीयों से तेल एकत्र करता दिखता है। किसी भी सरकार के लिये इससे शर्म की बात और क्या हो सकती है कि समाज के अंतिम आदमी का चेहरा ऐसा दिखता है। आजादी के बाद से हर सरकार हर बात में गरीबों के उद्वार की ही बात करती है। 70 साल के बाद भी भारत का गरीब दीयों से तेल एकत्र करता दिखता है। गरीब इस लिये गरीब है क्योंकि उसके पास काम नहीं है। देश में भीख मांगने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हर जगह ऐसे लोग रोटी के एक-एक टुकड़े के लिये संघर्ष करते देखे जा सकते हैं।

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