हैट्रिक की हनक

 

कहा जाता है कि जिसके साथ अपने लोग खड़े हो उसके साथ दूसरे लोग भी आ जाते हैं। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है जापानी जनता है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता की हैट्रिक बनाई है। संसद भंग कर समय से पहले चुनाव कराने का उनका दांव सही बैठा और घोषित चुनाव परिणाम के मुताबिक आबे के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 465 में से 312 सीटें जीत ली हैं। जबकि दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा 310 पर ठहरता है। आबे की इस जीत से अमेरिका को भी बल मिला है। दोनों देश मिलकर उत्तर कोरिया को सबक सिखाने की तैयारी भी कर रहे हैं।
दरअसल, आबे की नीतियों को अधिक ‘राष्ट्रवादी’ कहा जाता है। चीन-उत्तर कोरिया के मामले में उनका रुख सख्त रहा है। अमेरिका व अपने अन्य मित्र देशों के साथ उन्होंने सामरिक सहयोगा बढ़ाया है। वे जापान के ‘शांतिवादी संविधान’ में बदलाव करने की कोशिश में हैं। इसे लेकर विपक्ष उनकी आलोचना करता रहा है। इसके अलावा अपने से जुड़े लोगों के प्रति पक्षपात का भी उन पर आरोप लगता रहा है। इससे इस साल गर्मियों के समय आबे की लोकप्रियता गिरकर सिर्फ 30 फीसदी के करीब रह गई थी। फिर भी उन्होंने पिछले महीने संसद भंग कर समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया। हालांकि आबे का यह फैसला चुनाव परिणामों ने सही साबित कर दिया।
उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ की भी उम्मीद जगी है कि अब अमेरिका-जापान मिलकर उत्तर कोरिया पर नकेल कस सकते हैं। दरअसल, उत्तर कोरिया की परमाणु प्रसार नीति ने अमेरिका को हिलाकर रख दिया है। सनकी तानाशाह किम जोंग की हठता से शांतप्रिय देशों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो चली है। किम की यह मुहिम अमेरिका को डराने के लिए है या फिर चौथे विश्वयुद्ध की दस्तक कहना मुश्किल है, क्योंकि अमेरिका की लाख कोशिश और धमकी के बाद भी उत्तर कोरिया पर कोई असर पड़ता नहीं दिखता। उत्तर कोरिया की आणविक प्रयोगवाद की जिद उसे कहां ले जाएगी। वह परमाणु सम्पन्नता से क्या हासिल करना चाहता है। वैश्विक युद्ध की स्थिति में क्या वह अपने परमाणु हथियारों को सुरक्षित रख पाएगा? वह परमाणु अस्त्र का प्रयोग कर क्या अपने को सुरक्षित रख पाएगा। परमाणु अस्त्रों के विस्फोट के बाद उसका विकिरण और इंसानी जीवन पर पडऩे वाला दुष्परिणाम किसे झेलना पड़ेगा। उसकी यह मुहिम सिर्फ एक सनकी शासक की जिद है या फिर मानवीयता को जमींदोज करने एक साजिश।
उत्तर कोरिया को लेकर बढ़ती वैश्विक चिंता के बाद भी दुनिया इस मसले पर गंभीर नहीं दिखती, इसलिए अमेरिका की चिंता काफी गहरी होती जा रही है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की कड़ी सैन्य चेतावनियों के बाद भी किम की सेहत पर कोई असर फिलहाल नहीं दिख रहा। इस मसले पर चीन और रूस की भूमिका साफ नहीं है। किम की दहाड़ से यह साबित होता है कि रूस और चीन आणविक प्रसार को लेकर संवेदनशील नहीं हैं। उत्तर कोरिया लगातार परमाणु परीक्षण जारी रखे हुए है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की चेतावनी के बाद भी यूएन के सभी स्थायी सदस्य चुप हैं। इसकी वजह है कि सनकी शासक पर कोई असर नहीं दिखता है और वह मिशन पर लगा है। किम हाइड्रोजन बम का भी परीक्षण कर चुका है। उसका कबूलनामा और तस्वीरें दुनिया के सामने आ चुकी हैं। यही वजह है कि अमेरिका के साथ जापान को भी पसीने छूट रहे हैं, क्योंकि उत्तर कोरिया बार-बार ट्रंप की धमकियों को नजर अंदाज कर मुंहतोड़ जवाब देने की बात कह रहा है।
यह बात साफ होने के बाद कि कोरिया को पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर ने यह तकनीक पाकिस्तानी सरकार के कहने पर उपलब्ध कराई, जिसकी वजह से अमेरिकी सरकार और चिढ़ गई है। यही कारण है कि पाक की नीतियों को संरक्षण देने वाला अमेरिका उसे अब आतंकियों के संरक्षण का सबसे सुरक्षित पनाहगार मानता है। दूसरी बात है कि अमेरिका, भारत और जापान कि बढ़ती नजदीकियों से चीन और पाकिस्तान जल उठे हैं। इसकी वजह है कि रूस, चीन और पाकिस्तान कि तरफ से उत्तर कोरिया को मौन समर्थन मिल रहा है, लेकिन अब जिस तरह अमेरिका और जापान एक हो रहे हैं और भारत से उनकी दोस्ती बढ़ रही है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर कोरिया पर नकेल कसने की पूरी तैयारी हो चुकी है।
भारत, जापान और अमेरिका जिस तरह एक साथ आ रहे हैं, उससे तो एक बात तय है कि उत्तर कोरिया के खिलाफ एक नई कूटनीतिक चाल चली जा रही है। उधर, रूस ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि उत्तर कोरिया पुन: मिसाइल परीक्षण की तैयारी में जुटा है, जिसकी जद में अमेरिका का पश्चिम भाग होगा। वैसे अमेरिका कोरिया पर लगातर दबाव बनाए रखे हुए है। वह आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध भी लगा चुका है। जबकि रूस और चीन की तरफ से कोई ठोस पहल नहीं की गई। हालांकि अमेरिका किसी भी चुनौती के लिए तैयार खड़ा है। अमेरिका, कोरिया पर हमला करता है तो उस स्थिति में रूस और चीन की क्या भूमिका होगी, यह देखना होगा। दोनों तटस्थ नीति अपनाते हैं या फिर कोरिया के साथ युद्ध मैदान में उतर चौथे विश्वयुद्ध के भागीदार बनते हैं। क्योंकि यह बात करीब साफ हो चली है कि अमेरिका और उत्तर कोरिया में शीतयुद्ध के बाद की स्थिति आणविक जंग की होगी! क्योंकि किम को यह अच्छी तरह मालूम है कि सीधी जंग में वह अमेरिका का मुकाबला कभी नहीं कर सकता है। सैन्य ताकत के सामने किम की सेना और हथियार कहीं से भी टिकते नहीं दिखते।

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