आखिर बच्चे कैसे बन जाते हैं कातिल…

गुरुग्राम के बहुचर्चित प्रद्युम्न हत्याकांड में पिछले दिनों उस समय नया मोड़ आ गया जब केन्द्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने दावाकिया कि प्रद्युम्न की हत्या उसी स्कूल में 11वीं के छात्र ने की है।16 साल के इस छात्र को सीबीआई ने पिछले बुधवार को हिरासत में लिया और दावा किया कि उसने परीक्षा और अभिभावक शिक्षक बैठक यानी पेरेंट-टीचर मीटिंग को टलवाने के लिए प्रद्युम्न का कत्ल किया।मामला अभी अदालत में है, लेकिन हिरासत में लिये गये छात्र का परिवार इस आरोप को नहीं मानता उसके पिता ने कहा,‘मेरा बच्चा सुबह जिन कपड़ोंमें स्कूल गया था, उन्हीं साफ – सुथरे कपड़ों में वापस आया तो फिर इस बीच उसने कत्ल कैसे कर दिया? हमारे पास अदालत जाने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा है।’ अभियुक्त जो नाबालिग छात्र है, उन पांच लोगों में से है जो प्रद्युम्न के कत्ल के समय की सीसीटीवी फुटेज में टॉयलेट के आसपास नजर आए थे। यह भी जानना चाहिए कि वही है जिसने सबसे पहले माली को इसकी सूचना दी थी। हम जानते हैं कि प्रद्युम्न की हत्या गला रेतकर की गई थी। उस क्रूर हत्या के बारे में इस विषय पर सोचें कि बच्चे कब और कैसे कातिल हो जाते हैं । समस्या यह है कि वैल्यू एजुकेशन और फैमिली सपोर्ट धीरे-धीरे कम हो रहा है या खत्म होता जा रहा है। वे कहती हैं कि पहले बड़े परिवार होते थे, वैल्यू एजुकेशन यानी नैतिकशिक्षा होती थी। उसे फैमिली का सपोर्ट होता था। बच्चों को सिखाया-समझाया जाता था। मगर अब सब खत्म हो गया है। इतना ही नहीं, लगातार तनाव से जूझते माता-पिता की टेंडेंसी भी अग्रेसिव हो गई है। आजकल सभी सेल्फ सेंटर्ड हैं, सिर्फ अपनी-अपनी सोच रहे हैं। ऐसे में बच्चे भी वही सीखते हैं। सरकार को चाहिए कि जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बना रही है वैसे ही मेंटल हेल्थ पर भी काम करे। ऐसे क्रेच बनाने के लिए दबाव डालना चाहिए, जिनमें माएं काम करते हुए भी अपने बच्चों की देखभाल कर सकें। यह पूछने पर कि क्या ये मुमकिन है कि समय रहते पहचान लिया जाए कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है, जवाब में वो कहती हैं, ‘अपने बच्चे पर नजर रखें। कोई भी बच्चा पहली दफा में ही कत्ल नहीं कर देता। बहुत से ऐसे संकेत होते हैं। वह कई तरीकों से जाहिर करता है कि उसे मदद चाहिए। बच्चे की दिनचर्या में बदलाव दिखे या वह अजीब-सा व्यवहार करता दिखे तो सतर्क हो जाएं। उसका इलाज कराएं। छिपाने की कोशिश न करें।’क्या अभिभावक इसके अलावा भी ऐसा कुछ कर सकते हैं जिनसे ऐसी घटना को रोका जा सके। आजकल दाखिले इतने मुश्किल हो गए हैं कि एक अच्छे स्कूल में नर्सरी के एडमिशन के लिए भी लाखों रुपए भरने पड़ते हैं। ऐसे में बहुत से अभिभावक इस डर से शिकायत नहीं करते कि बच्चे को निकाल दिया जाएगां ऐसा न करें। लगातार स्कूल और अपने बच्चे को मॉनीटर करते रहें। स्कूल पर एक पेरेंट्स बॉडी बनाने का दबाव डालें जिसका कार्यकाल दो साल से ज्यादा न हो।’ अब सवाल उठता है कि स्कूली बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या क्या कदम जरूरी हैं ? बच्चे की बुरी आदतों पर कैसे करें काबू ? एहतियात अपनी जगह है, लेकिन इसका समाधान क्या हो सकता है ? इन सवालों का जवाब है कि ऐसे मामलों में स्कूलों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। स्कूलों को भी इससे निपटने के लिए कदम उठाने चाहिए और स्कूल में ऐसी व्यवस्था भी करनी चाहिए जिससे ऐसी स्थिति से निपटा जा सके। उन्होंने इसकी भी पैरवी की कि ऐसे मामलों में लापरवाही बरतने वाले स्कूलों से सख्ती से निपटना चाहिए और गंभीर मामलों में उनकी मान्यता भी रद्द कर देनी चाहिए।

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