धुआं-धुआं देश की राजधानी

देश की राजधानी दिल्ली के वायुमंडल में आजकल धुआं-धुआं सा है। अक्टूबर माह के बाद का यह रूटीन हो गया है। यह सर्दियों का कोहरा या कुहासा नहीं, बल्कि प्रदूषण है। दिल्ली एक गैस चैंबर बन चुकी है, अदालतों की ऐसी टिप्पणियां हम सुन चुके हैं, लेकिन कोई उपाय नहीं, जागरूकता नहीं, प्रयास नहीं। सुप्रीम कोर्ट दिवाली सरीखे बड़े त्योहार पर दिल्ली में पटाखे फोडऩे या जलाने पर पाबंदी थोप देती है, फिर भी पटाखों के जश्न जारी रहते हैं। उगती सुबह में इतना धुआं दिखता है कि सांसें फूलने लगती हैं, आंखें जलने लगती हैं और सुबह की सैर करना भी मुश्किल हो गया है। कहां तो सैर करना सेहत के लिए ‘आदर्श’ माना जाता रहा है, लेकिन हवा इतनी जहरीली है कि सुबह-शाम सैर करने की डाक्टरों ने मनाही की है। अब दिल्ली धुएं और प्रदूषण का आंगन बनी है। पीएम-10 का स्तर 645 तक पहुंच गया है, जो सामान्य से छह गुना है और दूसरी तरफ पीएम-2.5 का स्तर 406 तक पहुंच गया है, जो सात गुना है। प्रदूषण को जानने वाले इस भाषा को जानते हैं। यानी प्रदूषण का स्तर सामान्य हवा से कई गुना बढ़ गया है। सर्दियां शुरू हो रही हैं और खांसी, जुकाम, अस्थमा, दमा, आंखों में एलर्जी और बुजुर्गों में निमोनिया की बीमारियां पैदा हो रही हैं, उग्र रूप भी धारण करने लगी हैं। इस दौरान प्रख्यात हृदय रोग चिकित्सक एवं सर्जन डा. नरेश त्रेहन ने मीडिया में दो चित्र जारी किए हैं। हिमाचल के 55 वर्षीय पुरुष का फेफड़ा लाल रंग का है, जैसा प्राकृतिक तौर पर होता है, तो दूसरा चित्र दिल्लीवासी 52 वर्षीय पुरुष का था, जिसके फेफड़े का एक भाग काला हो गया है। प्रदूषण का प्रभाव! ऐसे फेफड़े वाले प्राणी कब तक जिंदा रहेंगे ? न तो प्रदूषण ने डराया, न अदालतों का खौफ है और न ही गैस चैंबर में घुट कर मरने का भय है, लिहाजा सरकारें कोई भी रही हों, दिल्ली के प्रदूषण को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की गई है, न ही नीतियां बनी हैं। इस तरह देश की राजधानी को भयावह और जानलेवा हालात के सामने परोस दिया गया है। राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल ने अब फटकार लगाई है, तो पुरानी हिदायतें नए सिरे से दोहराई जा रही हैं। फसलों की पराली और सूखे पत्ते न जलाए जाएं, निर्माण कार्यों पर कुछ वक्त के लिए बंदिशें थोप दी जाएं, बच्चों के स्कू ल बंद कर दिए जाएं, ट्रकों के रात में दिल्ली में प्रवेश पर भी रोक लगा दी जाए और वाहनों को लेकर ऑड-ईवन का अभियान एक बार फिर चलाया जाए। क्या दिल्ली के वायुमंडल का पर्यावरण इससे स्थायी तौर पर स्वच्छ हो जाएगा? क्या यही दिल्ली के प्रदूषण के स्थायी समाधान हैं? डाक्टरों का यहां तक कहना है कि प्रदूषण का बच्चों पर इतना घातक असर पड़ रहा है कि उनके दिमाग सिकूडऩे लगे हैं। इसके अलावा, दिल का दौरा, कैंसर, ब्रेन स्ट्रोक, फेफड़ों में इन्फेक्शन, इम्यून सिस्टम कमजोर होने आदि के गंभीर खतरे हैं या उस स्थिति की आशंकाएं आकार लेने लगी हैं। जहरीली हवा में सांस लेने से महिलाओं को गर्भपात हो सकता है। भू्रण के विकास की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। समय से पहले ही बच्चे का जन्म हो सकता है और जन्मते बच्चे का वजन भी कम हो सकता है। प्रदूषण की मार इतनी भयानक है कि देश भर में करीब पांच लाख मौतें हवा के प्रदूषण के कारण हो चुकी हैं। यह दौर चुनावों का है, लेकिन दुर्भाग्य है कि प्रदूषण कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। यह स्थिति देश की राजधानी की है, जहां तमाम बंदोबस्त किए जा सकते हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि दांव पर लगी होती है, लेकिन अब हकीकत यह है कि दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में शुमार हो गई है। चीन ने समाधान निकाल लिए हैं, लेकिन हम दिल्ली में हेलिकाप्टर से पानी भी बरसा नहीं सकते, जिससे प्रदूषण स्तर एकदम कम हो सकता है। मौजूदा दौर दिल्ली में स्वास्थ्य के आपातकाल सरीखा है। आकलन किया जा रहा है कि दिल्ली में रहने वाले औसत व्यक्ति की उम्र छह साल घट गई है। अभी तो नई पीढ़ी को अपना सफर शुरू करना है। क्या वे यूं ही मर-मर कर जियेंगे ?

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