जैसी कि संभावना थी इसके बाद सोशल मीडिया पर हैशटेग ‘हार्दिक एक्सपोज्ड’ टॉपिक ट्रेंड करने लगा. मजेदार बात है कि इन वीडियो से कोई भी चौंकाने वाली जानकारी सामने नहीं आई थी जिसकी बुनियाद पर कहा जा सके कि हार्दिक पटेल ‘एक्सपोज़’ हो गए हैं, यानी उनके चेहरे से मुखौटा उतर गया है. साथ ही साथ ऐसा कोई सबूत भी नहीं है कि जिससे पता चले कि वीडियो में कुछ गैरकानूनी काम हो रहा हो.

इस मामले से एक बार फिर निजता के अधिकार का मुद्दा बहस में आ गया है और इससे यह भी साफ हो गया है कि भारत में किस तरह इस अधिकार की धज्जियां उड़ाई जाती हैं. सत्ताधारी भाजपा अब तक इस मुद्दे पर शांत है, लेकिन उसके समर्थक वीडियो रिलीज और शेयर कर रहे हैं और इसके बहाने सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक में हार्दिक पटेल को निशाना बना रहे हैं.

हालांकि कुछ दिन पहले की एक घटना देखें तो भाजपा समर्थकों का यह रवैया बिल्कुल उल्टा जान पड़ता है. पिछले महीने दिल्ली के नजदीक गाजियाबाद से छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक पत्रकार को गिरफ्तार किया था. पुलिस का कहना था कि पत्रकार के पास छत्तीसगढ़ के एक नेता (राज्य की भाजपा सरकार में मंत्री) के वीडियो की सीडी हैं और वह इससे ब्लैकमेलिंग कर रहा था. जब पत्रकारों के साथ-साथ नागरिक समाज के एक हिस्से से इस गिरफ्तारी का विरोध किया तो इसके जवाब में छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिरीक्षक की दलील थी कि जब्त की गईं सीडी संबंधित व्यक्ति की छवि खराब कर सकती थीं इसलिए तुरत-फुरत यह गिरफ्तारी की गई है.

हार्दिक पटेल के मामले में भी ठीक यही तर्क लागू होना चाहिए और जो लोग वीडियो साझा कर रहे हैं या उसका प्रचार कर रहे हैं उनकी तुरंत गिरफ्तारी भी होनी चाहिए. या कम से कम टीवी चैनलों को आदेश दिया जाना चाहिए कि वे ऐसे वीडियो दिखाना बंद करें. वीडियो में जो भी दृश्य दिख रहे हैं वे संबंधित लोगों के निजी जीवन से जुड़े हैं और इससे किसी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए.

इसी अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक खंडपीठ ने कहा था कि निजता का अधिकार मूल अधिकार है. अदालत ने इसकी रक्षा को मानवीय गरिमा से भी जोड़ा था और उसका कहना था कि अगर किसी की निजता में दखल दिया जाता है कि तो उसके वाजिब कारण और उचित प्रक्रियाएं होनी चाहिए. इन मानदंडों पर देखें तो हार्दिक पटेल के वीडियो का प्रसारण और वितरण अनैतिक ही नहीं, गैरकानूनी भी है.