बेटियों की सुरक्षा के नाम पर

पिछले दिनों मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोचिंग से घर लौटती एक छात्रा ने खुद से गैंगरेप के बाद मां-बाप के साथ पुलिस थाने में जाकर घटना की रिपोर्ट लिखवानी चाही, तो तकरीबन बीस घंटे तक उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। पुलिस की इस उदासीनता का सरकार को पता चला तो उसने कई पुलिस अफसरों को हटा दिया। लेकिन इसके बाद मध्यप्रदेश सरकार का जो नजरिया सबके सामने आया, वह कोई कम हैरत में डालने वाला नहीं था।
सरकार ने कहा कि कोचिंग कक्षाओं से छात्राओं की वापिसी सात बजे तक हो जाए, या फिर कोचिंग सेंटर इन छात्राओं की मोबाइल टेक्नोलॉजी से मॉनिटरिंग की गारंटी करे। इस सरकारी सोच से साबित होता है कि उसकी निगाह में दुष्कर्म, बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए एकमात्र लड़कियां ही दोषी है। इस रूढि़वादी व पुरापंथी मानसिकता का बचाव नहीं किया जा सकता।
विडम्बना देखिये कि देश और राज्य में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की बात हो रही है, लेकिन किसी बेटी के घर से सौ मीटर दूरी पर ही कुछ बदमाश उसकी अस्मत लूटकर चले जाते है और सरकार व पुलिस तंत्र ऐसी घटनाओं को रोकने में निष्फल होने लगते हैं तो कहने लगते हैं कि शाम सात बजे के बाद बेटियों को घर से बाहर न निकलने दें। मध्यप्रदेश सरकार का ये नजरिया हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतों के फरमानों से पृथक नहीं है। ये खाप पंचायतें लडकियों के साथ हो रहे बलात्कारों का कारण उनका रात में जींस पहनकर घूमना और मोबाइल का प्रयोग करना बताती है। यही कारण था कि कुछ महीनों पहले राजस्थान की एक खाप पंचायत ने बेटियों के जींस पहनने व मोबाइल के प्रयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन, बेटियों ने यह प्रतिबंध तोडकर ऐसी गैर-कानूनी खाप पंचायतों के गलत फैसले को दरकिनार कर दिया।
अब मध्यप्रदेश सरकार का नजरिया यह है कि रात को सात बजे के बाद लड़कियों का शिक्षण संस्थाओं से आना बलात्कार का कारण बनता है। दरअस्ल, आज भी हमारे पूरे समाज पर पुरुष प्रधानता हावी है। औरत को आज भी दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जाता है। भले वे मुहावरे हो, कहावते हो, नारे हो सभी जगह पुरुषों का वर्चस्व दिखाया जाता है। कोई काम करने से पहले पुरुषों की राय व रजामंदी लेना हमारे समाज में मानों एक रस्म है। दीगर, समाज में लड़कियों को घास-फूस की तरह या पराया धन ही समझने की भूल की गयी है। आज भी बेटी के जन्म से लेकर शिक्षा व शादी की विदाई तक परिवार में कोई खास स्थान व अहमियत नहीं दी जाती है। बचपन में ही रसोई में धकेलकर उनके साथ नौकर की तरह बर्ताव किया जाता है। पुरानी कहावत आज भी प्रचलन में है-मां बेटे की खिचड़ी में घी ज्यादा डालती है। सबको कमाऊ पूत पसंद है !
मप्र की उक्त पीडि़ता के संदर्भ में यह समझने की जरूरत है कि पहले बलात्कार करने वाले तो बदमाश थे, लेकिन उसके बाद अपने हिंसक बर्ताव से बलात्कार की शिकार युवती और उसके परिवार के साथ और बलात्कार करने वाले सरकारी कुर्सियों पर बैठे वर्दीधारी हैं। इन विषम हालातों में मप्र के मुख्यमंत्री भले ही खुद को बेटियों का मामा ही घोषित क्यों न कर दे व उनका कन्यादान ही क्यों न करा दे, बलात्कारों से पूर्ण निजात संभव नहीं है। जब तक समस्या का जड़ पर प्रहार नहीं होगा, तब तक यह दंश काला कलंक बनकर सिर पर मंडराता ही रहेगा।
काश मध्य प्रदेश सरकार समझती कि बलात्कार की समस्या का समाधान सात बजे के बाद बेटियों को घर के बाहर निकलने या कोचिंग संस्था से देर रात तक घर लौटने पर रोक लगाना नहीं है, बल्कि नारी मूल्यों के प्रति गैर जिम्मेदार होते समाज को जिम्मेदार बनाना है। बेटियों को आत्मसुरक्षा के गुर सिखाना है, पुलिस तंत्र को दुरुस्त करना है, संदिग्ध इलाकों पर विशेष ध्यान रखना है, बेटियों में आत्मविश्वास भरना है व बदमाशों के दिलो-दिमाग में डर कायम करना है। यह कुछ उपाय काफी हद तक इस बीमारी की रोकथाम कर सकते है।

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