घर वापसी की कसक

विश्व सुंदरी बनने के बाद मानुषी छिल्लर जब  घर लौटीं तो उनका भव्य स्वागत हुआ। उपलब्धियों के साथ लौटे व्यक्ति की वापसी में भव्यता आ ही जुड़ती है। वरना घर तो रोज़ शाम को हम भी लौटते हैं। जिसमें न स्वागत की उमंग होती है और न ही भव्यता का उल्लास। आम आदमी को घर लौटने के बाद यदि एक प्याला गर्म चाय मिल जाए तो गनीमत है। आम आदमी तो दिन भर दफ्तर में बॉस की झिड़कियां खाकर लौटता है। उसका बॉस अपने बॉस की झिड़कियां खाता है। बॉस होने का सिलसिला जिस आदमी के पास आकर खत्म होता है, वह नेता जी की झिड़कियां खाकर अपनी नौकरी को धन्य मान लेता है। जिन लोगों का हाजमा ज्यादा अच्छा होता है वो झिड़कियों के साथ रिश्वत भी खा लेते हैं। थोड़ी सी झिड़की के बदले यदि थोड़ी बहुत रिश्वत भी मिल जाए तो किसी का क्या बिगड़ता है? दफ्तर से घर वापसी बॉस की इच्छा पर निर्भर करती है। किसी खास ठेकेदार की फाइल मेज पर आ गई हो तो उसे निपटाने के लिये रुकना लोकतांत्रिक दायित्व है। आप तो जानते हैं कि अफसरों का खास होने के लिये ठेकेदारों को क्या क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। दफ्तर से छूट कर सड़क पर आओ तो जगह-जगह लगा जाम आपको आगे नहीं बढ़ने देता। गाड़ी फंसाने वाला गोया आपको इस तरह समझाना चाहता हो-‘वहां कौन है तेरा/ मुसाफिर जाएगा कहां।’ लेकिन यदि आप चूके तो चौराहे पर खड़ा पुलिसवाला अपना डंडा लेकर आपका शानदार स्वागत करेगा। आम आदमी के लिये घर लौटना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता।
उसे पहले याद रखना होता है कि आलू-बैंगन- टिण्डे खरीदने हैं, बाबूजी की दवाई खत्म हो गई है, बिटिया का फोन रिचार्ज करवाना है, बेटे को स्कूल के लिये नई सफेद शर्ट की जरूरत है, मसाले लाना भूल गये तो कल उबली  सब्जी ही  मिलेगी। उस पर पत्नी का ताना-‘ऑफिस से जल्दी छूटे तो घर पहुंचने में इतनी देर क्यों ?’
वह घर में घुसते ही निगाह डायनिंग टेबल पर डालता है जिस पर टेलीफोन, बिजली, नल, अखबार वाले, केबल वाले के बिल पड़े रहते हैं। इन सबके बावजूद जब वह चाय पीने का दुस्साहस करता है तो उसे लगता है मानो मेज पर पड़ी हुई फरमाइशें उसे घूर रही हैं।
घर लौटने पर मां शिकायत करती है कि कोई उसकी बात पर ध्यान नहीं देता, बेटी शिकायत करती है कि दादी आजकल हर बात पर रोक-टोक करने लगी है, पत्नी शिकायत करती है कि काम वाली बाई ने आना छोड़ दिया है, बेटा शिकायत करता है कि उसकी मोटर साइकिल पुरानी हो गई है। तमाम शिकायतों और फरमाइशों के बीच घड़ी अपनी चाल से दौड़ती रहती है और आम आदमी अगली सुबह अखबारों में पढ़ लेता है कि घर वापसी पर किसी का शानदार स्वागत हुआ है।
वह अपनी घर वापसी की तुलना इस घर वापसी से करता और एक गहरी सांस लेकर ऑफिस जाने की तैयारी करने लगता है ।

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