पद्मावती हकीकत या फंसाना

“कहते उसको पद्मावती, धरती पर ज्यों उतरी रती।” 1988 में दूरदर्शन पर प्रसारित  सीरियल “भारत एक खोज” के 26वें एपिसोड “पद्मावती व तुगलक खानदान” की शुरुआत होती है इसी गीत से। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक “डिस्कवरी आॅफ इंडिया” पर आधारित इस ऐतिहासिक टीवी धारावाहिक में अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की कथा संजय लीला भंसाली की फिल्म “पद्मावती” का मूलाधार है।

दरअसल फिल्म व टीवी इंस्टीट्यूट पुणे से निकलते ही संजय भंसाली को पहला बड़ा ब्रेक  “भारत एक खोज” के एपिसोड 26 के संपादन सहायक के तौर पर मिला। इस ऐतिहासिक सीरियल का  निर्माण व निर्देशन श्याम बेनेगल ने किया था, जिसे भारत के सरकारी टीवी चैनल दूरदर्शन पर 1988 में प्रसारित किया गया। पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के ऐतिहासिक प्रसंग की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 45 मिनट 15 सेकेंड अवधि के इस एपिसोड में पूरे 40 मिनट पद्मावती गाथा पर ही फोकस रहे। शेष पांच मिनट में अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह तुगलक और मोहम्मद बिन तुगलक को समेट दिया गया।  गौरतलब है कि वरिष्ठ इतिहासकार इरफान हबीब ने उदयपुर में दावा किया है कि “जिस पद्मावती के अपमान को मुद्दा बनाकर करणी सेना और दूसरे संगठन विरोध कर रहे हैं, वैसा कोई पात्र वास्तविकता में था ही नहीं, क्योंकि पद्मावती पूरी तरह से एक काल्पनिक चरित्र है।” यही इरफान हबीब “भारत एक खोज” के एपिसोड 26 के परामर्शदाता थे। पद्मावती प्रसंग वाले इस सीरियल में जवाहरलाल नेहरू के लिखे ऐतिहासिक संदर्भों के हवाले से फिल्माये गए दृश्यों में राजा रतनसेन के सिंहल नगरी जाने, वहां की राजकुमारी पद्मावती को ब्याहकर चित्तौड़गढ़ लाने और अन्य कथा का विस्तार से वर्णन है। शीशे में पद्मावती की छवि देखकर अलाउद्दीन खिलजी के गश खा जाने की बात भी “भारत एक खोज” के इसी एपिसोड का हिस्सा है, जिसके सलाहकार खुद इरफान हबीब रहे और जिसमें एडिटिंग सहायक के तौर पर संजय लीला भंसाली ने काम किया था। पद्मावती की डोली में लोहार और एक बड़े सैन्य जत्थे का चित्तौड़ से दिल्ली छिपकर जाना, दिल्ली में बादशाह की कैद से राजा रतनसेन को छुड़ा लाना और फिर लड़ाई में रतनसेन के मारे जाने का भी जिक्र जवाहर लाल नेहरू के मूल कथानक पर आधारित श्याम बेनेगल के टीवी सीरियल में किया गया था।

जायसी से नेहरू तक
1234पद्मिनी सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन की बेटी थी। राजकुमारी पद्मिनी का प्रिय पालतू तोता सिंहल से मेवाड़ जाकर वहां के रावल रतनसेन से पद्मिनी के रूप लावण्य का ऐसा वर्णन करता है कि रतनसेन पद्मावती से विवाह के लिए व्याकुल हो उठते हैं। रतन सिंह से विवाह के पश्चात राजकुमारी पद्मिनी का नया नामकरण पद्मावती हुआ। सिंहल द्वीप आज के श्रीलंका को ही कहा जाता रहा। मेवाड़ का राजज्योतिषी चेतनराघव जादूटोने के चमत्कार भी करता था। चेतनराघव ने एक दिन रावल रतनसिंह को चामत्कारिक इंद्रजाल के बलपर अमावस्या के दिन दूज का चांद दिखा दिया। अगली रात फिर दूज का चांद निकला तो चेतन की पोल खुल गई और राजा ने उसे देश निकाला दे दिया। चेतनराघव की चालाकी और उसके तेजदिमाग से परिचित रानी पद्मावती को भय हुआ कि चित्तौड़ से अपमानित होकर निकाला जा रहा चेतन राघव कहीं राज्य के लिए अनिष्टकारी न बन जाए। इसी आशंकावश रानी ने चेतन को बुलवाकर उसे अपना एक कंगन देते हुए कहा कि यह आपकी दक्षिणा है, आप मेरे कल्याण के लिए ही प्रार्थना व पूजा करें। जिसका तात्पर्य था चित्तौड़ की रानी, उनके सुहाग और राज्य का कल्याण। किंतु धूर्त चेतन रानी का कंगन लेकर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के पास जा पहुंचा और कंगन दिखाते हुए रानी के रूप सौंदर्य का ऐसा वर्णन खिलजी से किया कि मुग्ध होकर देहली के तत्कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी ने राणा रतनसेन के पास दूत भेजकर रानी पद्मावती की मांग रख दी। राणा ने क्रुद्ध होकर अपमानजनक संदेशों के साथ दूत को दिल्ली बैरंग लौटा दिया। फलस्वरूप खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया। पद्मिनी को पाने की चाहत में खिलजी करीब 6 महीने तक चित्तौड़गढ़ के किले के चारों ओर डेरा डाले रहा। ‘भारत एक खोज’ सीरियल में भी दिखाया गया है कि अलाउद्दीन को दिल्ली पर मंगोलों 1518188 copyके हमले की जानकारी मिली तो उसने चित्तौड़ का घेरा उठाने का फैसला किया। किंतु रानी के दर्पण में दर्शन की शर्त रखकर राणा के साथ शतरंज खेलने की साजिश रचते हुए समझौता कर लिया। रानी को शीशे में देखकर उसके रूप सौंदर्य से गशखाकर खिलजी मूर्छित हो गया। चित्तौड़ किले से बाहर पहुंचाने आए राणा को धोखे से बंदी बनाकर वह रतन सिंह को दिल्ली ले गया। पद्मावती ने भी धोखे का जवाब धोखे से दिया और खिलजी की रानी बनने के लिए दिल्ली आने की यह शर्त रखी कि वह परदे में आएगी और अलाउद्दीन से मिलने के पहले राणा रतन सिंह को चित्तौड़ किले की चाभी सौंपेगी। पद्मावती के डोले में सैनिकों ने गोरा और बादल योद्धाओं के नेतृत्व में दिल्ली कूच किया और बंदी रतनसेन को छुड़ा लिया। रतनसेन दिल्ली से तो मुक्त हो गया किंतु चित्तौड़ की राह में युद्ध में मारा गया। लिहाजा पद्मिनी ने जौहर कर लिया। यही लोककथा है और जायसी के ‘पद्मावत’ का मूलतत्व भी, जिसका वर्णन बीसियों कवियों, लेखकों और साहित्यकारों ने किया। जवाहरलाल नेहरू की ‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया’ में हीरामन तोता व अालंकारिक साहित्यिक रूपकों व चमत्कारों को तो छोड़ दिया गया किंतु मूल कथानक को जस का तस रखा गया है। इन सभी साहित्यिक कृतियों में अला‍उद्दीन के पद्मावती पर मोहित होने का जिक्र है, किंतु कहीं भी पद्मावती के अलाउद्दीन से प्रभावित होने के बाबत कुछ नहीं कहा गया। अलाउद्दीन खिलजी को चित्तौड़ का घेरा छोड़कर दिल्ली लौटना पड़ा, क्योंकि मंगोलों की चगताई खानत का दिल्ली पर हमला हो गया। सन 1303 में हुए इस हमले और अलाउद्दीन के चित्तौड़ से दिल्ली शहर तक न पहुंच पाने का ऐतिहासिक प्रसंग रतनसेन के दिल्ली से छुड़ा ले आने के पक्ष में 3E4F88EE00000578-4318006-image-a-17_1489617582596 copyकथानक को बल देता है। अलाउद्दीन को तीन महीने सीरी फोर्ट में शरण लिये रहना पड़ा, जबकि दिल्ली के आसपास का सारा इलाका मंगोलों के कब्जे में रहा। जैसे रतनसेन का घेरा अलाउद्दीन नहीं तोड़ पाया था, उसी रणनीति को अपनाते हुए अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के हाथ खुद तक नहीं पहुंचने दिये। अंतत: मंगोल लूटपाट करके लौट गए और अलाउद्दीन ने फिर मंगोल हमलों के खिलाफ खैबर दर्रे से दिल्ली के बीच ऐसी मजबूत घेराबंदी की, जो मुगल हमलों तक काम आई और दिल्ली की जगह पानीपत का मैदान ही बन गया निर्णायक जंगों का गवाह।

नैतिकता बनाम ऐतिहासिकता
“भारत एक खोज” सीरियल में जिक्र है कि 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की। मलिक मोहम्मद जायसी के सूफी रूपक काव्य ‘पद्मावत’ के एक भाग में भी इस चढ़ाई का वर्णन है। लोककथा में मशहूर है कि अलाउद्दीन ने राणा रतनसेन की रानी पद्मावती पर मोहित होकर चित्तौड़ पर चढ़ाई की। पद्मावत की यह गाथा सामंतवादी दौर की परंपराओं की एक दिलचस्प मिसाल है, जिसमें नैतिक उपदेश ऐतिहासिक सच्चाई से ज्यादा महत्व रखता है। साहित्य सृजन के लिहाज से देखें तो ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ के लेखक जवाहरलाल नेहरू और पद्मावत के लेखक मलिक मोहम्मद जायसी दोनों ही अवध क्षेत्र और परिवेश में फले-फूले padukonm copyऔर शिक्षा-संस्कार व सामाजिक संदर्भों के कीर्तिस्तंभ हैं। जायसी और तुलसी अवधी के दो महानतम काव्यग्रंथी तो हैं ही, 1540 में पहली बार अवधी दोहे-चौपाई को आधार बनाकर महाग्रंथ लिखने वाले जायसी गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य कवि अग्रज भी रहे, जिन्होंने पद्मावत के लोककाव्य रूप में स्वीकार्य होने के पश्चात रामचरित मानस का जायसी की लेखनशैली और उसी लोकभाषा में लेखन प्रारंभ किया, जो 1577 में रामचरित मानस के रूप में पूर्ण हुआ। जहां जायसी ने जनभाषा अवधी को अपने लेखन का आधार बनाया, वहीं विलायत रिटर्न नेहरू ने जायसी की पद्मावती, तुलसी के राम को ऐतिहासिकता की कसौटी पर कसते हुए आधुनिक विश्व के समक्ष अधुनातन ग्राह्य फार्मेट में प्रस्तुत किया। नेहरू का इलाहाबाद जायसी की कर्मभूमि जायस और निर्वाणस्थल अमेठी के निकट ही है, यह नेहरू की जनभाव समझ ही थी, जिसके आधार पर साहित्य पर जबरदस्त पकड़ वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने पद्मावत की नैतिकता को ऐतिहासिकता से ज्यादा महत्ता दी। नेहरू और श्याम बेनेगल ने जायसी के पद्मावत की जिस नैतिकता को ऐतिहासिकता से ज्यादा महत्ता दी, तीस साल बाद उसी कथानक पर आधारित संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ पर विवाद होने के बाद रानी पद्मिनी के होने-न-होने पर प्रश्न उठाए गए। इतिहासकारों ने बयान दिए, सूफी कवि जायसी का गढ़ा किरदार तक बताया गया, ट्वीट भी किए गए। पिछले दिनों कई इतिहासकारों के हवाले से यह भी कहा गया कि पद्मिनी असल में नहीं थी, वह तो अपितु सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी के 1540 में रचे काव्य ‘पद्मावत’ का काल्पनिक पात्र थी। जायसी के इस महाकाव्य पर हिंदी साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने टीका और समीक्षा भी की है। जब बात ऐतिहासिकता की आती है तो राजस्थान से लेकर देशविदेश तक नैतिकता और पद्मावती की गरिमा की रक्षा का झंडा उठाए लोग रानी पद्मिनी के शहर चित्तौड़गढ़ में आज भी कई प्रमाण पद्मावती और रतनसेन की ऐतिहासिकता की गवाही के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। जैसे कि चित्तौड़गढ़ में रानी पद्मावती की एकमात्र मूर्ति आज भी देखी जा सकती है। उदयपुर के पास पद्मावती के बारे में तारीखों के साथ उल्लेख वाला शिलालेख भी मौजूद है।

चूक गए जावेद अख्तर
Padmavati copyगीतकार जावेद अख्तर ने पद्मावत फिल्म प्रकरण पर टिप्पणी करते हुए ट्वीट किया- ‘पद्मावत इतिहास नहीं, अपितु एक काल्पनिक कहानी है। पद्मावत पहला हिंदी नॉवल है, जिसे मलिक मोहम्मद जायसी ने अकबर के दौर में लिखा था। यह बिल्कुल वैसे ही है, जैसे कि अनारकली और सलीम।’ इस ट्वीट में ऐतिहासिक दृष्टि से खुद जावेद अख्तर चूक कर गए। वास्तव में मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत 1535 से 1540 के बीच लिखा था, 1542 में तो अमेठी के राजा के हाथों शेर के शिकार के धोखे में जायसी की हत्या हो चुकी थी। दूसरी ओर अकबर का जन्म हुआ था 1542 में। जायसी ने पद्मावत पूरा करते समय तत्कालीन काव्य परंपरा का पालन करते हुए उस काल के शासक के रूप में शेरशाह सूरी का जिक्र किया है, जिसने अकबर के पिता हुमायूं से गद्दी छीनी थी और 1545 तक शेरशाह का दौर था, न कि अकबर का।

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