बिना तैयारी प्रदूषण से लड़ाई

पर्यावरण को जानलेवा न बनने देने की चुनौती को अब टाला नहीं जा सकता। हर दिन के साथ यह विकराल होती जा रही है। जो उपाय किए जा रहे हैं, वे नाकाफी  सिद्ध हो रहे हैं। कभी रेल पटरियों पर कोयले के इंजन भर-भर धुआं उगलते थे, फिर डीजल इंजन लाए गए कि धुआं कम हो, और अब बिजली से चलने वाले इंजन हैं जो धुआं करते ही नहीं। इसी तरह डीजल के बजाय सीएनजी से बसें चलाना शुरू हुआ, कारों में भी सीएनजी इस्तेमाल की जाने लगी, फिर भी प्रदूषण की समस्या कम होने के बजाय और बढ़ गई है। सरकार ने अब आगामी वर्ष से वाहनों के लिए बीएस-6 स्तर का पेट्रोल-डीजल मुहैया करने का फैसला किया है। इसे देखते हुए उसी मानक वाले इंजन भी लाने होंगे। पेट्रोलियम मंत्रालय का दो वर्ष पूर्व ही यह नियम लागू कराने का कदम सही दिशा में है। राजधानी दिल्ली में प्रदूषित हवा की गंभीर चुनौती को देखते हुए यह उचित भी है। 2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन में हुई सहमति के लिहाज से देखें तो ऐसे निर्णय लेने का यही समय है, लेकिन इसकी सफलता को लेकर कुछ संशय भी हैं। पहली बात तो यही है कि इसको अभी केवल दिल्ली में लागू किया जा रहा है, और दूसरा संशय यह है कि क्या वाहन बनाने वाली कंपनियां बीएस-6 के इस्तेमाल लायक कारें व अन्य वाहन इतने कम समय में उपलब्ध करा सकेंगी?
इस नए नियम की सफलता के लिए जरूरी है कि तेल और वाहनों के इंजन दोनों ही एक साथ उपलब्ध कराए जाएं। अभी ऑटो वाहनों के लिए बीएस-4 मानक वाला ईंधन (तेल) उपलब्ध कराया जा रहा है और उसी के मुताबिक इंजन बनाए जा रहे हैं। सरकार अब सीधे बीएस-6 मानक लागू कर रही है तो क्या वाहन निर्माता उसके लिए तैयार हैं? देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारूति सुजुकी के वरिष्ठ कार्यकारी निदेशक (विक्रय) आरएस कलसी कहते हैं- ‘इन उपायों से समाधान नहीं होगा। प्रदूषण की चुनौती का हल समेकित नीति से ही किया जा सकता है। तत्काल बीएस-6 मानक के इंजन वाले वाहन उपलब्ध कराने के लिए समय चाहिए। हम बीएस-4 पर हैं, अचानक कैसे उस स्तर के इंजन तैयार किए जा सकते हैं!’ ऑटो निर्माता संगठन के अध्यक्ष डॉ. अभय फिरोदिया कहते हैं-‘सरकार के इस फैसले से ऑटो निर्माताओं को भरोसा हो गया है कि एक अप्रैल, 2020 से पूरे देश में बीएस-6 स्तर के इंजन वाले वाहन प्रयोग में आ सकेंगे। इस दौरान निर्माताओं को नए बनाए जा रहे इंजनों के परीक्षण का मौका भी मिल जाएगा।’स्पष्ट है कि कार निर्माताओं को केवल एक शहर के लिए नए स्तर के इंजन बनाने के अपने कार्यक्रम को नए सिरे से तय करना होगा। लेकिन उनका कहना है कि तकनीकी कारणों से वे सरकार के निर्धारित समय- एक अप्रैल, 2018 तक बीएस-6 मानक वाले इंजनों की पहली खेप कैसे तैयार कर पाएंगे? वे इसीलिए यह तारीख एक अप्रैल, 2020 ही बने रहने देना चाहते हैं।उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि मौजूदा इंजनों में ही दो जरूरी पुर्जे लगाकर नए ईंधन के इस्तेमाल लायक बनाने की युक्ति अपनाई भी जाए तो इतने कम समय में परीक्षण का बुनियादी काम कैसे पूरा हो सकेगा! अभी तक निर्माता बीएस-5 स्तर के इंजनों को 2019 तक उपलब्ध कराने की तैयारियों में व्यस्त थे, लेकिन अब उसको छोड़कर सीधे बीएस-6 मानक के लिए कहा जा रहा है, जबकि उसे तकनीकी स्तर पर बनाकर पूरा करने और परीक्षण के बाद ग्राहकों को सौंपने का कार्यक्रम तो 2024 में देने का था। हालांकि पहले बीएस-5 मानक वाले इंजन भी 2021 तक तैयार होने थे, लेकिन सरकार ने 2015 में इसकी मियाद दो साल घटा दी थी।कार निर्माताओं के तर्क को सही माना जाए तो बीएस-6 श्रेणी के इंजनों के उपयोग से हवा की शुद्धता पर तो कुछ थोड़ा सा ही फर्क पड़ेगा, लेकिन उसकी वजह से वाहनों की कीमत में 20 हजार से दो लाख रुपये तक का इजाफा जरूर हो जाएगा। यहां ध्यान देने की बात है कि प्रदूषण घटाने का यह पूरा कार्यक्रम काफी खर्चीला भी है। बीएस-6 स्तर का ईंधन तैयार करने पर तेल निर्माता कम्पनियों को कम से कम 40 हजार करोड़ और कार निर्माताओं को 50 हजार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। डीजल चालित इंजनों पर यह खर्च पेट्रोल से भी अधिक आएगा।हमारी तुलना में यूरोपीय देश प्रदूषण नियंत्रण के मामले में काफी आगे चल रहे हैं। 27 यूरोपीय देशों में 2008-09 से ही यूरो-6 की शुरुआत कर दी गई थी। जापान ने भी 2008 में ही इसे अपना लिया था। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में 2009 से यह व्यवस्था लागू है। लेकिन चीन अब भी यूरो-4 और यूरो-3 मानक का ही उपयोग कर रहा है। रूस भी इस मामले में यूरोपीय देशों से काफी पीछे है।बीएस-6 का स्तर हासिल करने का उद्देश्य बिल्कुल सही है। एक प्रश्न और है कि आज प्रदूषण की समस्या केवल एक या दो-चार शहरों तक सीमित नहीं है, उससे लगभग पूरा देश पीड़ित है। अतः सरकार जो भी नीति या नियम बनाए, उसको राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ही बनाना होगा।

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