अयोध्या पर राजनीति

उन कारणों पर जाने की अावश्यकता नहीं है जिसके चलते शीर्ष अदालत ने बहुचर्चित अयोध्या विवाद मसले पर सुनवाई की तिथि आठ फरवरी तय कर दी है। हालांकि, इस पेचीदा मसले पर शीर्ष न्यायालय नवंबर से नियमित सुनवाई कर रहा था तो जल्दी फैसले की आस जरूर थी। मगर गुजरात के ऊंचे राजनीतिक तापमान के  बीच  तुरंत किसी फैसले की उम्मीद भी नहीं थी। बहरहाल, इस मसले को लेकर कांग्रेस व सत्तारूढ़ दल द्वारा की जा रही बयानबाजी ने पेचीदगियां बढ़ा दी हैं। कांग्रेस दलील दे रही है कि मसले को टाला जाये और 2019 के आम चुनावों के बाद ही अंतिम फैसला आये। सवाल उठता है जब लगातार पांच साल कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं तो कब तक इस मसले को लटकाया जा सकता है? जब इस मसले पर आपसी बातचीत व राजनीतिक समाधान की सर्वमान्य कोशिशें विफल हो चुकी हैं तो फिर अदालत में देर करने का क्या औचित्य है। दरअसल, इस मसले पर हमारी राजनीतिक व सामाजिक कोशिशें विफल हुई हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा विवाद सुलझाने के फॉर्मूले को जिस तरह दोनों पक्षों द्वारा नकारा गया, उससे तो अब देश की शीर्ष अदालत से ही उम्मीदें बंधती हैं। वहां मामले को लटकाये रखने का कोई तार्किक आधार नजर नहीं आता। मसले की संवेदनशीलता के मद्देनजर राजनीतिक दलों को रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।


वैसे यह विडंबना ही है कि जब देश तमाम तरह की मूलभूत सुविधाओं के संकट से कई मोर्चे पर जूझ रहा है तो मंदिर-मस्जिद के विवाद में देश को उलझाया जा रहा है। अब तक इस मुद्दे का जमकर राजनीतिक दोहन हो चुका है। कई बार तो लगता है कि अब बदलते परिदृश्य में यह मुद्दा राजनीतिक नजरिये से प्रासंगिक नहीं रह गया है, मगर फिर गाहे-बगाहे नये सिरे से मुद्दे को गरमाने की कोशिश हो जाती हैं। दरअसल, मुद्दे के दोहन की इस सोच पर अब विराम लग जाना चाहिए। अब तक देश ने इस विवाद की बड़ी कीमत चुकाई है। अब बहुत हो चुका है, देश के राजनीतिक नेतृत्व को, जनमानस को मानसिक रूप से तैयार करना चाहिए कि वे शीर्ष अदालत के फैसले को सहर्ष स्वीकार करें। ऐसा नहीं होता तो विवाद से उपजा सामाजिक तनाव देश की प्रगति को पलीता लगाता ही रहेगा। यह ठीक है कि आस्था तर्कों से परे है, मगर देश में गंगा-जमुनी संस्कृति को जीवंत रखने के लिये किसी सीमा तक समझौता किया ही जाना चाहिए। किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र में किसी विवाद का इतने लंबे समय तक खिंचना बेहद चिंता की बात है। देश के सामने आज इससे बड़ी कई चुनौतियां हैं, जो प्राथमिकता के आधार पर समाधान मांगती हैं।

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