इस मंजर में राहुल गांधी!

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को बधाई, शुभकामनाएं और ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद…!  राहुल गांधी के प्रति हमारे भाव  बदले नहीं हैं। दरअसल यह राहुल की ताजपोशी का मंजर है। कट्टर प्रतिद्वंद्वी प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्हें बधाई दी है। यह मंजर वैचारिक, राजनीतिक विचारों के विश्लेषण का नहीं है। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का नेतृत्व युवा हाथों ने संभाला है, लिहाजा यह सकारात्मक मंजर है। राहुल ने खुद को ‘मैं युवा भारत हूं’ करार दिया है, लिहाजा एक उम्मीद का मंजर है। राहुल गांधी की राजनीतिक शैली, सोच, अभिव्यक्ति के हम कभी भी पक्षधर नहीं रहे, क्योंकि उसमें अपरिपक्वता है, अनुभवहीनता है और संभाषण का कोरापन है। शायद देश की ज्यादातर जनता ने इसीलिए उन्हें स्वीकारा नहीं है। राहुल ने जिंदगी के जो मंजर देखे हैं, सहे और जिये हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में भी राहुल का आकलन किया जाना चाहिए। 22 जून, 1970 को जब राजीव-सोनिया गांधी के परिवार में राहुल का जन्म हुआ, तब दादी इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। प्रधानमंत्री आवास और परिवार में सुरक्षा के तंग,चौतरफा घेरे…घर की चारदीवारी…एक अजीब-सा डर और उसके साथ नत्थी दहशत…खामोशी और अकेलेपन के घुप्प अंधेरे…बेशक राहुल का बचपन सामान्य नहीं था। उन्हें घर के भीतर ही दादी की मौत देखनी पड़ी और फिर कुछ सालों बाद पिता का जला-भुना, क्षत-विक्षत शव देखा। लिहाजा छोटी उम्र में ही ऐसी हत्याएं और हिंसा देखकर राहुल गांधी के मानस पर भयावह आकृतियां छप गई होंगी। लिहाजा कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर जब उन्होंने भाजपा को निशाना बनाते हुए कहा कि वे आग लगाते हैं, हम बुझाते हैं। वे तोड़ते हैं, हम जोड़ते हैं। तो उसमें बीता हुआ मंजर ही प्रतिबिंबित हो रहा था। वैसे कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी पार्टी के विचार, सोच और एजेंडे पर बोलते, तो वह ज्यादा सकारात्मक कथन माना जाता। भाजपा तो कांग्रेस की बुनियादी प्रतिद्वंद्वी है ही। पूरी राजनीति इसी के इर्द-गिर्द चलनी है, लेकिन ताजपोशी के मंजर में व्यक्ति ज्यादा शालीन और विनम्र रहता है। बहरहाल कांग्रेस में ‘राहुल-मंजर’ की शुरुआत हो चुकी है। हालांकि बीते तीन साल से कांग्रेस के भीतरी मुद्दों को राहुल ही देख रहे थे, लेकिन अंतिम मुहर की गुंजाइश रहती थी। अब सर्वेसर्वा राहुल ही हैं, लिहाजा यह मंजर नए दायित्व-बोध का भी है। राहुल को विरासत में कांग्रेस  का लुंज-पुंज, बिखरा, निराश संगठन मिला है। जो चुनौती सामने है, वह पूरी तरह संगठित और व्यापक है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी तिलिस्म के मुकाबले राजनीति करनी है, लिहाजा इस मंजर में सबसे बड़ी चुनौती यही हो सकती है कि किस तरह कांग्रेस को मंडल स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक लामबंद किया जाए। यह आसान काम नहीं है, बल्कि भगीरथ प्रयास की तरह होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार ‘कांग्रेस-मुक्त’ का नारा दिया है, तो राहुल समानांतर नारा दे सकते हैं-देश को गरीबी-मुक्त, बेरोजगारी-मुक्त, भुखमरी-मुक्त करने की पहली जरूरत है। भारत न कभी कांग्रेस मुक्त हुआ है और न ही ऐसे आसार हैं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसमें भाजपा और विपक्ष के तौर पर कांग्रेस की मौजूदगी अपरिहार्य है। उसके बिना लोकतंत्र तानाशाही में तबदील हो सकता है। राहुल गांधी को यह जानकारी भी होगी कि तमिलनाडु में 1967 से कांग्रेस सत्ता के बाहर है। पश्चिम बंगाल में 1977 से सत्ता हासिल नहीं की जा सकी है। इनके अलावा, गुजरात, उप्र, बिहार, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, नगालैंड, ओडिशा और सिक्किम आदि राज्यों में भी कांग्रेस लंबे अंतराल से सत्ता के बाहर है। हिमाचल बारे भी आज फैसला होगा। राजस्थान, झारखंड, उत्तराखंड, हरियाणा और पूर्वोत्तर के पांच राज्यों में भी भाजपा शासित सरकारें हैं। कांग्रेस के पल्ले पंजाब और कर्नाटक दो ही प्रमुख राज्य बचे हैं। उनमें से कर्नाटक में मई, 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह मंजर राहुल गांधी के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। लेकिन सबसे चुनौतीपूर्ण है-कांग्रेस में आमूल परिवर्तन। कांग्रेस के दुश्मन कांग्रेस के भीतर ही हैं। कांग्रेस को उन मुद्दों पर गहन मंथन करना पड़ेगा,जिनके आधार पर वह लोगों में कांग्रेस के प्रति आकर्षण पैदा कर सकेगी। राहुल को उप्र में अखिलेश यादव और गुजरात में हार्दिक पटेल, अल्पेश, जिग्नेश के समर्थन और सहयोग से एहसास हो गया होगा कि बैसाखियों के सहारे कांग्रेस दूर तक नहीं चल सकती। उस तरह राहुल प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे का मुकाबला नहीं कर सकते। लिहाजा खुंदक की राजनीति शुरू करने के बजाय राहुल को अपना ‘घर’ पहले ठीक और मजबूत करना होगा। हमें लगता है कि उन्हें 2019 को लक्ष्य बनाकर तुरंत जुट जाना चाहिए।

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