फिर मोदी के नाम जनादेश !

गुजरात और हिमाचल का जनादेश भाजपा के ही पक्ष में रहा। खासकर गुजरात का चुनाव बेहद पेचीदा और फंसा हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने वह मंजर भी पार किया। 22 साल से अधिक की लगातार सत्ता के बावजूद गुजरात में छठी बार भाजपा की ताजपोशी हो रही है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों की बड़ी जीत है। बेशक भाजपा ने मिशन 150 प्लस तय और घोषित किया था और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी अनौपचारिक तौर पर 140-142 सीटें गिनवा रहे थे, लेकिन सत्ता विरोधी रुझान, असंतोष, नाराजगी, विक्षुब्ध युवा, बेरोजगारी, महंगाई आदि स्थितियों के बावजूद भाजपा को 100 के आसपास सीटें मिली हैं। बेशक 2012 के जनादेश की तुलना में कुछ सीटें कम रह गई हैं, लेकिन यह भाजपा की गौरवान्वित जीत है, क्योंकि लोकतंत्र में लगातार इतने लंबे और सकारात्मक जनादेश नहीं मिला करते। यदि गुजरात में भाजपा ने कांग्रेस और जातिवादी युवाओं की राजनीति को पराजित किया है, तो उसने खुद भी धर्म के जरिए ध्रुवीकरण की कोशिश की थी। विपक्ष में कांग्रेस के हिस्से 80 के करीब सीटें आई हैं। 2012 की तुलना में 16 सीटें ज्यादा…! बेशक कांग्रेस एक बार फिर विपक्ष में बैठेगी, लेकिन इस चुनाव और जनादेश ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘नेता’ जरूर बना दिया है। कांग्रेस की इस हार को भी ‘सम्मानजनक’ करार दिया जाना चाहिए। जीएसटी, नोटबंदी, कपास के किसानों से सौतेलापन और उनकी आत्महत्याएं, महंगी शिक्षा, बिखरते और बंद होते कारोबार आदि मुद्दों पर जिस तरह भाजपा सरकार और प्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री मोदी को लगातार निशाना बनाया जाता रहा, उसके मद्देनजर भी कांग्रेस की राजनीति एक बार फिर नाकाम रही है। दरअसल गुजरात के वरिष्ठ चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का गुजरात के साथ एक खास तरह का जुड़ाव रहा है। जब तक वह कोई भारी, गंभीर गलती नहीं करेंगे, किसी बड़े घोटाले में नहीं फंसेंगे, तब तक मोदी को गुजरात में हराना नामुमकिन है। दूसरे, गुजरात हिंदू-मुसलमान में विभाजित है। वहां तमाम जातियां बेमानी हैं। भाजपा हिंदुओं की और कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है। इसी धारणा के तहत नाराज पटेलों ने भी भाजपा को वोट दिए। नतीजतन सूरत, जो पटेलों और व्यापार का सबसे बड़ा गढ़ है, में भाजपा ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। इस जनादेश को जीएसटी पर ‘जनमत संग्रह’ के तौर पर भी देखा जा सकता है। भाजपा का परचम दक्षिण, उत्तर और मध्य गुजरात में भी खूब लहराया है। हालांकि सौराष्ट्र-कच्छ में भाजपा कांग्रेस से कुछ पीछे रही है और ग्रामीण इलाकों में भी कांग्रेस की तुलना में उसे छह-सात फीसदी वोट कम पड़े हैं। यह चुनाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण रहा है, क्योंकि भाजपा के पास जो 34 सीटें थीं, उन पर कांग्रेस विजयी रही है और जिन 26 सीटों पर कांग्रेस काबिज थी, उन्हें भाजपा ने जीत कर हासिल किया है। इस तरह 60 सीटों पर अदला-बदली का जनादेश स्पष्ट करता है कि लोगों में अपने दलों और नेताओं के प्रति विरक्ति के भाव पैदा हो गए हैं। यानी अब चुनाव को एकतरफा नहीं माना जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी की गुजरात में ‘हवा’ है, लोकप्रियता है, लेकिन उन्हें ‘अपराजेय’ नहीं आंका जा सकता। आने वाले राज्यों के चुनावों में यह स्पष्ट होकर सामने आ सकता है। इस जनादेश से कांग्रेस एक सबक ले सकती है। अब उसे एहसास हो जाना चाहिए कि सांप्रदायिकता की लड़ाई घटिया जातिवाद से नहीं जीती जा सकती। दूसरे, विपक्ष की भूमिका साढ़े चार सालों तक कोई और निभाए और अंतिम वर्षों में आप चुनाव जीतना चाहें, तो जीत संभव नहीं है। संगठन को कांग्रेस ही मजबूत करेगी, कोई और करने वाला नहीं है और संघ-भाजपा के मजबूत संगठन का फिलहाल मुकाबला नहीं किया जा सकता। कांग्रेस को देश को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि वह और उसके सहयोगी दल का गठबंधन ही एक वैकल्पिक और बेहतर, पारदर्शी शासन दे सकता है। इस भरोसे के भी अंतराल के बाद जनता का नजरिया बदल सकता है। बहरहाल इस चुनाव के ‘सरदार’ प्रधानमंत्री मोदी हैं और गुजरात, हिमाचल में भाजपा सरकारें बन रही हैं, लेकिन ध्यान देना चाहिए कि इस चुनाव में विकास कहीं खो गया था। चुनाव विकास पर या मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ पर नहीं लड़ा गया, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी, ‘गुजरात के बेटे’ सरीखे भावुक मुद्दों पर लड़ा गया। फिर भी जीत तो भाजपा के हिस्से आई है और वह विजेता है, लेकिन प्रधानमंत्री की निजी प्रतिष्ठा जरूर सवालिया हो रही है। उसके मद्देनजर भाजपा मंथन जरूर करेगी।

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