खतरे की आहट देती रणनीतिक करवटें

वर्ष के प्रथम प्रभात से पैगाम मिला कि भावनाओं को सिर्फ घरेलू उपभोग के लिए मसालेदार छौंक लगाया जा सकता है। वैश्विक मंच पर परीक्षित रिश्तों की डोर को थामे रखने में ही अक्लमंदी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान को तगड़ी धमकी देते हुए उसकी आर्थिक मदद रोक कर भारतीय राजसत्ता को एकबारगी मुग्ध कर दिया। अफगानिस्तान में भारत को इस्तेमाल करने की गरज से एनडीए सरकार की पीठ भी थपथपा दी। राजनीति की बांछें खिल गईं। लेकिन राजनय और सामरिक रणनीति के चश्मे से जब सारे माजरे पर पैनी नजर डाली तो पूरा खेल समझ में आने लगा।
आज जब चीन बड़ी चतुराई से हमारी चौतरफा घेरेबंदी में काफी हद तक सफल हो गया है तो हमारे लिए ईरान की मैत्री बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। ईरान में अचानक भीतरी असंतोष के विस्फोट सुनाई देने लगे। मौजूदा सरकार के खिलाफ सड़कों पर तेज तर्रार प्रदर्शन होने लगे। बेरोजगारी और गरीबी में इजाफे के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए सैकड़ों से ज्यादा युवक सड़कों पर निकल पड़े। मशाद शहर से शुरू हुए प्रदर्शन तेहरान तक पहुंच गये। सुरक्षा बलों ने शक्ति प्रयोग भी किया, जिसमें करीब दो दर्जन प्रदर्शनकारी मारे गये। ईरान में असंतोष भड़कने के पीछे अमेरिकी हाथ होने के आरोप देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनी ने लगाते हुए कहा कि शरारत कहीं बाहर से हुई है। राष्ट्रपति हसन रुहानी ने भी ऐसे ही संकेत दिए। इनकी पुष्टि उस समय हो गई जब डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनों का समर्थन करते हुए कह दिया कि यह महान ईरानियों की भूख, दमन और आजादी के लिए पनपते आक्रोश का विस्फोट है। अमेरिकी नीयत का खुलासा उस समय हो गया जब ट्रंप ने कहा कि ईरान में बदलाव का समय आ गया है।
ईरान में मजहबी सरकार को हटाने के मंसूबे अमेरिका मुद्दत से पालता आ रहा है। वह वक्त की सूई को उस दौर में ले जाना चाहता है जब रजा शाह पहलवी ईरान के सर्वेसर्वा हुआ करते थे। तब भारत को भी ईरान के सम्राट से भावनात्मक लगाव रहता था, क्योंकि उन्हें आर्य मिहिर कहा जाता था। ईरानी राजवंश देश में इस्लाम के प्रवेश के पूर्व के कालखंड की स्मृतियों को भी सहलाने में सुख की प्रतीति अनुभव करता था। परंतु न तो गया हुआ वक्त लौट सकता है और न ही वर्तमान सत्तातंत्र के क्रांतिकारी प्रहरी पुरानी व्यवस्था को लौटने देना चाहते हैं। रही बात भारत की तो उसके राष्ट्रीय हित भी ईरान की वर्तमान सत्ता के साथ सुरक्षित हैं। भारतीय वित्तीय और तकनीकी सहयोग से ईरान मे बना चाबहार बंदरगाह भारत के लिए व्यावसायिक, सामरिक और सांस्कृतिक संपर्कों के विस्तार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अभी उसका प्रथम चरण ही पूरा हुआ है और आगामी चरण के निर्माण की गति में किसी भी प्रकार की अशांति व्यवधान डाल सकती है। इस दृष्टि से सोचा जाए तो अमेरिकी शह पर ईरान में भड़की अशांति भारतीय हितों पर भी चोट करती है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान की सामरिक-आर्थिक सहायता रोकना अच्छा है। उसे दोगले चरित्र वाला दगाबाज मुल्क कहना भी हमें सुहाता है। हमें यह भी अच्छा लगता है कि इधर अफगान सरकार ने अमेरिकी इमदाद से तालिबान पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिये हैं। ट्रंप की डांट-डपट से पाक ने हाफिज सईद को फिर से नजरबंद कर दिया है। फिर भी भारत को अपनी सूझबूझ और अपने बलबूते पर पाकिस्तान-चीन गठजोड़ के मुकाबले के लिए कारगर रणनीति बनानी होगी। गत कुछ समय के घटनाक्रम और मोदी सरकार द्वारा किये गये फैसलों से इस बात की प्रतीति हो रही है कि भीतरी राजनीतिक हितों पर वैश्विक रणनीति को विशेष महत्व दिया जाने लगा है। जब ट्रंप ने येरुशलम को इस्राइल की राजधानी घोषित करते हुए फिलीस्तीन को झटका दिया तो भारत ने उस फैसले से किनारा कर लिया। इसके साथ ही भारत ने फिलीस्तीन को आश्वस्त किया कि उसके साथ उसके संबंध पूर्ववत बने रहेंगे। भारत की इस भूमिका का त्वरित परिणाम यह हुआ कि आतंकी सरगना हाफिज सईद के साथ इस्लामाबाद में पदस्थ जिस राजनयिक ने मंच साझा किया था, उसे फिलीस्तीन सरकार ने फौरन वापस बुला लिया।
वक्त के तकाजे को भांपते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन पर नववर्ष की बधाई देने के साथ ही रूस के साथ सामरिक सहयोग बढ़ाने की इच्छा भी व्यक्त कर दी। पुतिन की प्रतिक्रिया भी सकारात्मक रही। राजनीति और रणनीति के जानकारों ने भाजपानीत एनडीए सरकार से अमेरिकी और इस्राइल परस्त होने की जो धारणा बना रखी थी, उसे धता बताते हुए मोदी सरकार ने इस्राइल की प्रमुख हथियार निर्माता कंपनी से 50 करोड़ डालर की खरीदी का करार अचानक रद्द कर दिया। पहली बार इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेत्नयाहू की भारत यात्रा के दौरान हुए टैंक रोधी गाइडेड मिसाइलों की खरीदी के बहुप्रचारित सौदे को रद्द करके सबको विस्मित कर दिया। रूस को महत्व दिये जाने का तात्कालिक कारण है चीन की हायपरसोनिक मिसाइलों से भारत की सुरक्षा को उत्पन्न खतरे को विफल करने लिए रूस से परिष्कृत मिसाइलों के आयात की आवश्यकता।
यह सर्वज्ञात तथ्य है कि 1990 में सोवियत संघ के बिखर जाने के बावजूद रूस एक बड़ी सैन्य शक्ति है। गत 7 वर्षों में कुल मिलाकर रूस की मैत्री भारत के लिए उपयोगी रही है। रूस ने भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देने से भी हमेशा गुरेज किया है। भारत को सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान की आईएसआई द्वारा प्रशिक्षित-संरक्षित आतंकवाद से है। स्वंय रूस भी आतंकवाद के दंश झेलता रहा है। यह खतरा अभी भी बना हुआ है।

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