क्या बिहार में लालू सा करिश्मा दिखा पायेंगे तेजस्वी?

यह कैसा विरोधाभास है? सीबीआई की विशेष अदालत ने करीब 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले में लालू यादव को साढ़े तीन साल की जेल और पांच लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई, लेकिन लालू की पार्टी और समर्थक उसे प्रधानमंत्री मोदी और हिंदूवादी ताकतों की साजिश करार दे रहे हैं। बिंब इस तरह पेश किया जा रहा है मानो लालू सामाजिक न्याय के नाम पर कोई कुर्बानी दे रहे हों! गरीब, पिछड़ों, दलितों, वंचितों और सामाजिक न्याय के किसी पुरोधा के साथ अन्याय हो रहा है! मामला घोटाले का है, सालों-साल जांच हुई है और अदालत में सुनवाई जारी रही है। लालू यादव पहले भी जेल की सजा काट चुके हैं। चारा घोटाले के तहत यह देवघर कोषागार से 89.4 लाख रुपए की फर्जी निकासी का मामला है। कई पूर्व सांसदों और पूर्व आईएएस अधिकारियों को भी सजा सुनाई गई है। अभी कुछ और केस शेष हैं। उनमें भी लालू मुख्य अभियुक्त हैं। चारा घोटाले के उजागर होने के वक्त लालू यादव संयुक्त बिहार (झारखंड समेत) के मुख्यमंत्री थे। पीएसी और कैग की रपटों के जरिए इस घोटाले का पर्दाफाश हुआ। नंगापन यह रहा कि रपटों के बावजूद सरकारी खजाने से धन की अवैध निकासी का सिलसिला जारी रहा। 1997 के उस दौर में जब लालू यादव को जेल जाना पड़ा था, तब नरेंद्र मोदी भाजपा के संगठन में कार्यरत थे और हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे। केंद्र में इंद्र कुमार गुजराल की सरकार थी, जिस संयुक्त मोर्चे का घटक लालू का राजद भी था और कांग्रेस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। तब कैसे मोदी और भाजपा साजिश कर सकते थे? अब फैसला अदालत का है और उसे स्वीकार करना चाहिए। न्याय के लिए अदालतों में ही लडऩा चाहिए। देश में न्याय पालिका की स्वायत्तता जरूर बची है, जिसे सरकारें प्रभावित नहीं कर सकतीं। अपवादों को छोड़ दीजिए। लालू यादव देश के प्रधानमंत्री भी बन सकते थे, यह मुगालता उनका बेटा तेजस्वी ही पाल सकता है। लालू की पार्टी के सर्वाधिक 20 सांसद तब चुन कर आए थे, जब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार-1 बनी थी। नतीजतन, लालू रेल मंत्री बने थे। यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। फिलहाल, लोकसभा में लालू के राजद के मात्र चार सांसद हैं। प्रधानमंत्री बनने के लिए कमोबेश 273 सांसदों का समर्थन अनिवार्य है। बहरहाल यह सामाजिक न्याय और दबे-कुचलों की लड़ाई नहीं है। यह विशुद्ध रूप से भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश का मामला है, जिसमें लालू भी लिप्त साबित हुए हैं। बेशक कोई भी विश्लेषक लालू यादव को बिहार में पिछड़ों का चेहरा और जुबान मानता रहे, लेकिन हकीकत यह है कि लालू ने अपनी राजनीति के लिए इन तबकों का दुरुपयोग किया है। नतीजतन ये तबके आज भी गुंडई करते हैं या अभावों में जीवनयापन कर रहे हैं। विकास लालू और उनके परिवार का जरूर हुआ है, जिनके पास अकूत संपत्ति है। बेटी मीसा और दामाद शैलेश तक के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय दो आरोप-पत्र दाखिल कर चुका है।
सवाल है कि यदि लालू घोटालों में संलिप्त नहीं रहे, तो अकूत धन-दौलत, प्लॉट, मकान, फार्महाउस सरीखी संपदाएं कहां से अर्जित की गईं? लालू या उनके परिजन कोई उद्योग तो चलाते नहीं हैं। लालू, पत्नी राबड़ी देवी, बेटे और बेटियां सभी ‘करोड़पतिÓ कैसे हैं? एक दिन ये मामले भी अदालत में खुलेंगे। तब जो फैसले सामने आएंगे, वे देश को चौंका सकते हैं! बहरहाल, अब संकट लालू के राजद के सामने है। बेशक उनके समर्थक 2019 के आम चुनावों में हिंदूवादी ताकतों को परास्त करने की गालबजाई करते रहें, लेकिन बिहार में ही अस्तित्व बचाने की चुनौती तेजस्वी यादव और राजद के नेताओं के सामने होगी। फिलहाल बिहार में राजद के 80 विधायक हैं। उन्हें समेट और सहेज कर रखने की बड़ी चुनौती लालू परिवार के सामने है। लालू को ज्यादातर वक्त जेल में ही बिताना पड़ेगा, क्योंकि उनके खिलाफ तीन-चार मामले और भी विचाराधीन हैं। उनमें भी करोड़ों रुपए सरकारी खजाने से अवैध तौर पर निकासी के आरोप हैं। एक मामले का फैसला तो आने वाला है। यदि हाई कोर्ट से लालू को जमानत नहीं मिलती है, तो उन्हें जेल से मुक्ति कैसे मिल सकती है। खुद लालू को चुनाव लडऩे के अयोग्य घोषित कर रखा है चुनाव आयोग ने। बेशक बिहार में लालू का राजनीतिक करिश्मा रहा है, लेकिन वह उनके बेटे तेजस्वी के पास नहीं है। फिर पार्टी के कुछ बड़े नेता भी तेजस्वी का नेतृत्व स्वीकार क्यों करेंगे? पार्टी में बिखराव के आसार भी पैदा हो सकते हैं, लेकिन लालू और उनके परिवार को मानना पड़ेगा कि यह लड़ाई पूरी तरह भ्रष्टाचार की है। लालू के संरक्षण में भ्रष्टाचार किया गया था। जनता अब ऐसे निष्कर्षों को खूब जानती है। सलाखों के पीछे लालू

यह कैसा विरोधाभास है? सीबीआई की विशेष अदालत ने करीब 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले में लालू यादव को साढ़े तीन साल की जेल और पांच लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई, लेकिन लालू की पार्टी और समर्थक उसे प्रधानमंत्री मोदी और हिंदूवादी ताकतों की साजिश करार दे रहे हैं। बिंब इस तरह पेश किया जा रहा है मानो लालू सामाजिक न्याय के नाम पर कोई कुर्बानी दे रहे हों! गरीब, पिछड़ों, दलितों, वंचितों और सामाजिक न्याय के किसी पुरोधा के साथ अन्याय हो रहा है! मामला घोटाले का है, सालों-साल जांच हुई है और अदालत में सुनवाई जारी रही है। लालू यादव पहले भी जेल की सजा काट चुके हैं। चारा घोटाले के तहत यह देवघर कोषागार से 89.4 लाख रुपए की फर्जी निकासी का मामला है। कई पूर्व सांसदों और पूर्व आईएएस अधिकारियों को भी सजा सुनाई गई है। अभी कुछ और केस शेष हैं। उनमें भी लालू मुख्य अभियुक्त हैं। चारा घोटाले के उजागर होने के वक्त लालू यादव संयुक्त बिहार (झारखंड समेत) के मुख्यमंत्री थे। पीएसी और कैग की रपटों के जरिए इस घोटाले का पर्दाफाश हुआ। नंगापन यह रहा कि रपटों के बावजूद सरकारी खजाने से धन की अवैध निकासी का सिलसिला जारी रहा। 1997 के उस दौर में जब लालू यादव को जेल जाना पड़ा था, तब नरेंद्र मोदी भाजपा के संगठन में कार्यरत थे और हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे। केंद्र में इंद्र कुमार गुजराल की सरकार थी, जिस संयुक्त मोर्चे का घटक लालू का राजद भी था और कांग्रेस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। तब कैसे मोदी और भाजपा साजिश कर सकते थे? अब फैसला अदालत का है और उसे स्वीकार करना चाहिए। न्याय के लिए अदालतों में ही लडऩा चाहिए। देश में न्याय पालिका की स्वायत्तता जरूर बची है, जिसे सरकारें प्रभावित नहीं कर सकतीं। अपवादों को छोड़ दीजिए। लालू यादव देश के प्रधानमंत्री भी बन सकते थे, यह मुगालता उनका बेटा तेजस्वी ही पाल सकता है। लालू की पार्टी के सर्वाधिक 20 सांसद तब चुन कर आए थे, जब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार-1 बनी थी। नतीजतन, लालू रेल मंत्री बने थे। यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। फिलहाल, लोकसभा में लालू के राजद के मात्र चार सांसद हैं। प्रधानमंत्री बनने के लिए कमोबेश 273 सांसदों का समर्थन अनिवार्य है। बहरहाल यह सामाजिक न्याय और दबे-कुचलों की लड़ाई नहीं है। यह विशुद्ध रूप से भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश का मामला है, जिसमें लालू भी लिप्त साबित हुए हैं। बेशक कोई भी विश्लेषक लालू यादव को बिहार में पिछड़ों का चेहरा और जुबान मानता रहे, लेकिन हकीकत यह है कि लालू ने अपनी राजनीति के लिए इन तबकों का दुरुपयोग किया है। नतीजतन ये तबके आज भी गुंडई करते हैं या अभावों में जीवनयापन कर रहे हैं। विकास लालू और उनके परिवार का जरूर हुआ है, जिनके पास अकूत संपत्ति है। बेटी मीसा और दामाद शैलेश तक के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय दो आरोप-पत्र दाखिल कर चुका है।
सवाल है कि यदि लालू घोटालों में संलिप्त नहीं रहे, तो अकूत धन-दौलत, प्लॉट, मकान, फार्महाउस सरीखी संपदाएं कहां से अर्जित की गईं? लालू या उनके परिजन कोई उद्योग तो चलाते नहीं हैं। लालू, पत्नी राबड़ी देवी, बेटे और बेटियां सभी ‘करोड़पतिÓ कैसे हैं? एक दिन ये मामले भी अदालत में खुलेंगे। तब जो फैसले सामने आएंगे, वे देश को चौंका सकते हैं! बहरहाल, अब संकट लालू के राजद के सामने है। बेशक उनके समर्थक 2019 के आम चुनावों में हिंदूवादी ताकतों को परास्त करने की गालबजाई करते रहें, लेकिन बिहार में ही अस्तित्व बचाने की चुनौती तेजस्वी यादव और राजद के नेताओं के सामने होगी। फिलहाल बिहार में राजद के 80 विधायक हैं। उन्हें समेट और सहेज कर रखने की बड़ी चुनौती लालू परिवार के सामने है। लालू को ज्यादातर वक्त जेल में ही बिताना पड़ेगा, क्योंकि उनके खिलाफ तीन-चार मामले और भी विचाराधीन हैं। उनमें भी करोड़ों रुपए सरकारी खजाने से अवैध तौर पर निकासी के आरोप हैं। एक मामले का फैसला तो आने वाला है। यदि हाई कोर्ट से लालू को जमानत नहीं मिलती है, तो उन्हें जेल से मुक्ति कैसे मिल सकती है। खुद लालू को चुनाव लडऩे के अयोग्य घोषित कर रखा है चुनाव आयोग ने। बेशक बिहार में लालू का राजनीतिक करिश्मा रहा है, लेकिन वह उनके बेटे तेजस्वी के पास नहीं है। फिर पार्टी के कुछ बड़े नेता भी तेजस्वी का नेतृत्व स्वीकार क्यों करेंगे? पार्टी में बिखराव के आसार भी पैदा हो सकते हैं, लेकिन लालू और उनके परिवार को मानना पड़ेगा कि यह लड़ाई पूरी तरह भ्रष्टाचार की है। लालू के संरक्षण में भ्रष्टाचार किया गया था। जनता अब ऐसे निष्कर्षों को खूब जानती है।

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