रंग जिनसे कोई मुक्ति नहीं चाहता

मालिनी अवस्थी, प्रसिद्ध लोक गायिका

भारत के सभी त्योहारों में होली का अलग महात्म्य है। बसंत पंचमी, यानी माघ की शुक्ल पंचमी से ही बसंत का आगमन माना जाता है, जो उल्लास, आशा और प्रेम का संचार कर जाता है। कठिन श्रम से निखरी रबी की फसल जब खेत में पककर तैयार हो जाती है, आमों में बौर आ जाते हैं, मादक बयार बहने लगती है, कोयल कूकने लगती है, ऐसे में कंठ से स्वर लहरियां स्वत: फूटने लगती हैं। धमार, डेढ़़ ताल, चौताल, फाग, उलारा, चौता की अनुगूंज उत्सव का माहौल रच देती है। बसंत पंचमी से ही गांव-गांव में फाग या फगुआ की तान सुनाई देने लगती है। लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर ढोलक, मृदंग, करताल, झांझ बजाते हुए फाग व होरी गाते हैं। कभी किसी पेड़ के नीचे, कभी खेत के किनारे, तो कभी किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के द्वार के सामने, अवध नगरिया छाई रे बहरिया, भल रंग खेलैं, होरी चारों भइया, केसर भरी कंचन पिचकारी हांथन राम के सोहे, रंग रंगीली होली खेलैं सब के हृदय बसैया

इस दौरान हमारे आराध्य कभी फाग के गीतों में रंग उड़ाते, कभी ढोलक बजाते, तो कभी नृत्य करते दिखाई देते हैं। पूरे उत्तर भारत में गाया जाने वाला उलारा होली खेलें रघुबीरा  हो या आज बिरज में होली मोरे रसिया  इन गीतों को गाते हुए जन-साधारण को अपने इष्ट राम और कृष्ण बहुत अपने से लगने लगते हैं। ढोलक बजाते राम और मंजीरा बजाते लक्ष्मण, मानो अपने में से कोई एक हो, अयोध्या के राजा राम नहीं। राधा को रंगने की योजना बनाते श्रीकृष्ण उनको अपने अंतर्मन में ऐसे बसाते हैं, जैसे कान्हा घर का ही कोई तरुण हो, गीता का ज्ञान देने वाला योगेश्वर नहीं। राम और कृष्ण, दोनों ही भारतीय लोक के हृदय में विराजमान हैं। वे इष्ट भी हैं और लोक नायक भी। अत: पर्व-उत्सव उनके बिना अधूरे ही हैं। अवध में यदि राम और सिया फाग खेलते हैं, तो बृज में राधा और कृष्ण।

बिरज में होली कैसे खेलूं रे सांवरिया के संग/ अबीर उड़ते, गुलाल उड़ते उड़ते सातों रंग/ भर पिचकारी सन्मुख मारी सखियां हो गईं तंग, तबला बाजै सारंगी बाजै और बाजै मृदंग, कान्हा जी की बंसी बाजै राधा जी के संग  यहां तक कि महादेव भी फाग खेलते दिखते हैं। कभी गौरा जी के साथ, तो कभी श्मशान में भस्म लपेटे, नर मुंडों से खेलते हुए, जीवन के शाश्वत सत्य का परिचय कराते हुए- आजु सदाशिव खेलत होरी, जटा जूट में चंद्र विराजे, अंग भभूत रमोरी,  लेइ गुलाल संभु पर डारत, रंग में तन मन बोरी, भइल लाल सब देह संभु के, गण सब करत ठिठोरी।

होली ही एकमात्र पर्व है, जिसमें आज भी ग्राम गीतों की टेर सुनाई देती है। नगर, महानगर और बहुखंडी अट्टालिका में रहने वाले शहरी जीवन शैली में ढले लोगों को आज भी होली के पारंपरिक गीत उसी कालखंड में ले जाते हैं, जहां पनघट पर जाती नायिकाओं को रंगने की योजना बनाते किशोर छिपे खड़े हैं। जहां टेसू के फूलों से बने केसरिया रंग की पिचकारी से वातावरण केसरिया हो गया है। जहां आज भी किसान झूम-झूमकर चौता गाते हैं और घूंघट की ओट से सलज्ज ग्राम वधुएं प्रत्युत्तर में फाग गाती हुई झूमती हैं बरजोरी करो न

मोसे होरी में, जा रे बावर ढीठ लंगरवा,  बतरस तोरी रस घोरी रे बरजोरी।

लोक जीवन में पर्वों-उत्सवों के प्रति एक आंतरिक और नैसर्गिक उल्लास पाया जाता है, जो नगरीय जीवन में देखने को नहीं मिलता। वैसे ही, जैसे नगरीय जीवन में पलाश का वृक्ष नहीं दिखता, पक्षियों की बोली नहीं सुनाई देती, नदी का बहाव नहीं दिखता, और सबसे बड़ी बात, रमने की प्रवृत्ति नहीं मिलती, रमे बिना आनंद कहां? उत्सव वही है, जहां आनंद है। आनंद के लिए निश्छल मन चाहिए, जो आज भी कृषक समाज में ही दिखता है। उनके लिए होली इसीलिए महत्वपूर्ण है। फाल्गुन मास तक आते-आते कृषक समाज धनधान्य से पूर्ण हो गया होता है, शीत का प्रकोप कम हो गया होता है, फसल पक चुकी होती है, इसलिए काम का बोझ भी कम है, ऐसे में किसान हर रात अलाव जलाकर उसके समीप बैठकर गाते हैं। गांव-गांव में लोककंठों से बसंती बयार में शृंगार भाव से सिक्त गीत सुनाई देते हैं- रंग डारो, रंग डारो, गोरी बैठी है घूंघट निकाल मुंह पे रंग डारो।

होली समरसता का प्रतीक है। रंगने का आध्यात्मिक प्रयोजन भी यही है। एक निर्गुन को सुन इसे सहज समझा जा सकता है- लाल हरो समाज में, को जाने को ‘राम’, जहां सभी रंग में सराबोर हों, वहां कोई राम को कैसे पहचाने? एक बिरहा फाग में छंद पढ़ा जाता है- या होरी को का कोऊ  जाने, होरी को रस रसिक ही जाने, मड़ई और महल दूनो एक हुई जावें/ राजा और रंक दूनो मिलि होली गावैं।  जाति, धर्म, वर्ग के सभी भेदभाव को तोड़ती होली इसीलिए देश का लाडला पर्व है।

होली का विशेष आनंद इसके रंजन पक्ष के कारण है। हास्य-विनोद, मसखरी-ठिठोली होली के विशेष उपांग हैं। फिर चाहे, वह होली खेलने का अंदाज हो या होली में गाए जाने वाले विभिन्न गीत हों। फागुन में बुढ़ऊ देवर लागे फागुन में।  यह गीत गाते हुए और घूंघट के पीछे हंसती नारियों के मुंह से यह गीत सुनकर घर के बुजुर्ग आंगन में थिरकने लगते हैं। संभवत: इसी कारण जोगीरा गाने की परंपरा का विकास हुआ। समसामयिक घटनाओं एवं परिवेश को लखकर कहे गए जोगीरा को गाने और सुनने लोगों की आज भी भीड़ जुट जाती है। एक टोली में जोगी का वेश धरे और ढोल-करताल संग जोर से जोगीरा सररर की टेर लगाता है और शेष समूह वाह भई वाह, वाह खिलाड़ी वाह की पुनरावृत्ति करते हैं। इसकी लय तेज होती जाती है।

जीवन में सभी रंग हैं और होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें जीवन के सभी रस व्याप्त हैं, होली के बहाने समाज आनंद का चरम प्राप्त कर रंग खेल, अपनों के साथ उत्सव मना विश्रांति पाता है और पुन: नई ऊर्जा, नए उत्साह के साथ नववर्ष के स्वागत को जुट जाता है।

कबीर होली पर अलग दृष्टि रखते हुए कह उठते हैं- अबीर लपटाइ तिरिया हांसे।  निर्गुण, निराकार ईश्वर पर अपने प्रेम रूपी रंग डालकर उन्हें साकार बनाकर वर्ष-प्रतिवर्ष यही संदेश आत्मसात करना, मोह-माया, राग-द्वेष, सब इन्हीं रंगों की तरह हैैं, इनमें रंगना भी है, बचकर निकलना भी है, और मुक्त भी होना है। लेकिन होली का रंग प्रेम का रंग है, जिससे कोई कभी मुक्त नहीं होना चाहता। यह और भी गाढ़ा हो, और चटख हो, फागुन के रंगों से चटख हो हम सबका जीवन।

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