कलेजा फाड़ देने वाला हादसा 

संजय तिवारी 
यह केवल दुखद ही नहीं है। कलेजा फाड़ देने वाली घटना है। एक व्यक्ति की लापरवाही ने 13 मासूमो की जान लेली। कई परिवार संतानविहीन हो गए। कई माताओ की गोद उजाड़ गयी। अभी – अभी तो सभी के माता पिता ने नहला धुला कर , तैयार कर सभी को स्कूल भेजा था।  अभी तो ठीक से पाव भी नहीं फटी थी।  अभी तो वे वही खड़े थे कि नौनिहालों के काट जाने की खबर आ गयी। कुशीनगर जिले के विशुनपुरा थाना क्षेत्र के दुदही बहपुरवा रेलवे क्रॉसिंग पर गुरुवार की सुबह 6.50 बजे सिवान से गोरखपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन की चपेट में स्कूली बच्चों से भरी वैन आ गई। वैन के परखच्चे उड़ गए। पूर्वोत्‍तर रेलवे के मुख्‍य जनसंपर्क अधिकारी संजय यादव ने बताया कि दुदही के पास वैन ड्राइवर ने रेलवे क्रॉसिंग को पार करने की कोशिश की। गेट मित्र ने वैन के ड्राइवर को रोकने की कोशिश की, लेकिन ड्राइवर नहीं रुका।  वैन रेलवे क्रॉसिंग पर बंद हो गई, जिसके चलते हादसा हो गया। चश्मदीदों का कहना है कि हादसे के वक्त ड्राइवर इयरफोन लगाए हुए था। यूपी के एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) आनंद कुमार के मुताबिक, “हादसे में 13 बच्चों की मौत हो गई। ड्राइवर की लापरवाही से ये हादसा हुआ।
 
   यूपी में इससे पहले भी  स्कूल बस के साथ हादसे हो चुके हैं लेकिन उन हादसों से किसी ने कोई सबक नहीं लिया।  न सरकार , न ही प्रशासन। 19 जून 2017 को उत्तर प्रदेश के ही एटा जिले में ट्रक और स्‍कूल बस की टक्‍कर में 12 बच्‍चों की मौत हो गई थी। हादसे में स्‍कूल ड्राइवर ने भी दम तोड़ दिया। जुलाई 2016 में वाराणसी-इलाहाबाद रेल खंड के कैयरमऊ रेलवे क्रॉसिंग पर भी बच्चों से भरी स्‍कूल वैन ट्रेन की चपेट में आ गई थी। हादसे में 10 बच्चों की मौत हो गई और कई गंभीर रूप से घायल हुए थे। कैयरमऊ भी मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग थी। सवाल यह उठता है कि आखिर इन हादसों को हम कब तक होने देना चाहते हैं। प्रश्न केवल एक हादसे भर का नहीं है। आप सरकारी बसों में भी यात्रा कर के देख लीजिये। उनमे भी अधिकाँश ड्राइवर मोबाइल पर बात करते और कण में इयार फोन लगा कर गाने सुनते मिलेंगे। रात्रिकालीन सेवाओं में तो यह आम बात है। आखिर इनको प्रशिक्षित , निर्देशित और व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी किसकी है ?
देश में 70 साल से हम केवल लाइसेंस बाँटते चले आ रहे हैं। कभी इन गलतियों के लिए दण्डित करने के प्राविधान पर नहीं सोचा। एटा और कैयरमऊ की घटनाओ के बाद भी संवेदनाएं व्यक्त कर , मुआवजे बाँट कर सभी निश्चिन्त हो गए थे। सरकार या शासन , प्रशासन ने यदि चालकों को इस दिशा में सतर्क किया होता तो शायद आज इन 13 मासूमो की जान नहीं जाती। इससे भी बड़ी गलती उन स्कूल प्रबंधको की है जो छह सीटर वन में 25 बच्चो को धोने की व्यवस्था बनाते हैं। यहाँ बच्चो के प्रति कोई संवेदना नहीं दिखती ,केवल सर गईं कर पैसा बटोरने की नीयत रहती है। इन स्कूलों के प्रबंधन पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाती सरकार। यह कड़वी सच्चाई है कि प्रदेश में इस तरह के हादसों को यदि रोकना है तो सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे ,लेकिन यह कडा कदम कब उठेगा , इसके बारे में कुछ कह पाना बहुत कठिन है। यह कठिनाई इसलिए भी है क्योकि जनपदों में प्रशासन की कार्यशैली ऐसी रह ही नहीं गयी है कि उससे कोई सकारात्मक उम्मीद की जा सके।
जहां तक रेलवे की बात है तो वर्ष 2015  में रेल मंत्रालय ने बताया था कि देशभर में करीब 13,500 मानवरहित क्रॉसिंग हैं। 25 सालों में करीब पांच हजार लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। पिछले साल रेलवे कन्वेंशन कमेटी ने संसद में एक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें कहा गया था कि बीते पांच साल में देश में मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों में 50% की कमी आई है। रिपोर्ट में बताया गया कि मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर 2012-13 में 53 हादसे हुए। 123 लोगों की मौत हुई। वहीं 2016-17 में हादसों की संख्या घटकर 20 हो गई और इनमें 40 लोगों की मौत हुई। कमेटी ने यह भी बताया कि बीते पांच साल में देशभर में 6169 मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग खत्म की गईं। इनमें से 2016-17 में सबसे ज्यादा 1503 खत्म की गईं।

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