केवल चौथे स्तंभ पर है लोगों का विश्वास, उठाएंगे पत्रकारों का मुद्दा: उप मुख्यमंत्री

 समाज को राह दिखाने वाला पत्रकारों का हो रहा है शोषण

पत्रकार की हालत श्रमिकों से भी खराब

पत्रकारों के काम के घंटे भी तय करने होंगे

लखनऊ। ईवीएम, संसद  और न्यायपालिका तक पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं। केवल चौथे स्तंभ पर  लोगों का विश्वास कायम है। उसे बचाकर रखना होगा। इसलिए सनसनी फैलाने वाली खबरों से पत्रकारों को बचना होगा। यह बातें मंगलवार को प्रेस क्लब में आयोजित मजदूर दिवस के अवसर पर उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कही।

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि जो पत्रकार समाज को राह दिखाता है वह स्वयं शोषण का शिकार है। उन्होंने कहा कि यूनियन की मांगों से सहमत है। इस पर मुख्यमंत्री से बात करेंगे । उप मुख्यमंत्री ने कहा कि आवास, बीमा और अन्य सुविधाओं को लेकर सरकार के सामने वह मुद्दों को उठायेंगे। यही नहीं पत्रकारों के कुछ मुद्दे हैं। उन्हें भी तय करने होंगे। 24 घंटे पत्रकार भटकते हैं। उनके घंटे भी तय करने होंगे।

पत्रकारों का मानसिक श्रम ज्यादा होता है। पत्रकारिता हजारों साल पहले भी थी। नारद पहले पत्रकार थे, लेकिन अब गतिविधियों में काफ भी अंतर आया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता आइएफ डब्ल्यूजे के अध्यक्षत के विक्रम राव ने की। सभा को यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के महामंत्री पीके तिवारी, लखनऊ मण्डल एवं लखनऊ इकाई के अध्यक्ष शिव शरन सिंह, मंडल मंत्री के विश्वदेव राव के अलावा वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह, प्राशु मिश्रा, नीरज श्रीवास्तव और राजकुमार आदि ने संबोधित किया।

पत्रकारिता की व्यस्तता के बीच हम सब एक-दूसरे के सुख-दुख में शरीक होते हैं यह बड़ी बात है। ये विचार एनयूजे (आई) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विवेक जैन ने व्यक्त किये। श्री जैन मंगलवार को यूपी जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन एवं लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के तत्वाधान में आयोजित श्रमिक दिवस व आद्द पत्रकार देवर्षि नारद जयंती की पूर्व संध्या पर विचार गोष्ठी में बतौर मुख्य  अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने कहा कि श्रमिकों के काम के घंटे तय करना ही श्रमिक दिवस मनाये जाने के पीछे की एकमात्र वजह नहीं है।

पत्रकार की जवाबदेही संपादक के प्रति नहीं प्रबंधन के  है आधीन

पत्रकार की हालत श्रमिकों से भी खराब स्थिति में हैं। पत्रकार की जवाबदेही संपादक के प्रति होती थी। आज स्थिति बदल चुकी है। आज किसी को नियुक्ति पत्र नहीं मिलता, आज संविदा व्यवस्था लागू हो गयी है जो खतरनाक है। पत्रकार आज प्रबंधन के आधीन हैं। उन्होंने कहा कि हम पत्रकारों के सुख-दुख में शरीक हो। बीमारी आदि में मदद करें। इससे एकजुटता और समरसता आयेगी। एक-दूसरे के साथ खड़े होना ही हमारी एकजुटता है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के संकट को कैसे दूर करें, स्तर की गिरावट को कैसे ठीक करें। इस पर विचार किये जाने की जरूरत है।

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