बापू जो ‘बलात्कारी’ है !

 

कल तक जो ‘भगवान’ था, आज वह बलात्कारी है। जिसके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सजते थे और वह खुद को ‘शिव का अवतार’ मानता था, आज बलात्कारी के तौर पर जेल में है। होली के पर्व पर आपने भी उस शख्स का ‘कमंडल डांस’ देखा होगा या भगवान कृष्ण की तरह बांसुरी बजाता वह खुद भी नाचता होगा, आज जीवन भर, यानी मृत्यु तक, जेल में रहने को आ गया है। भारत की एक अच्छी-खासी आबादी उसकी दीवानी थी। घरों में तस्वीर लगाकर फूलमाला पहनाई जाती और पूजा-पाठ किए जाते थे। बड़े-बड़े राजनेता उसके चरणों में शीश झुकाते थे। ऐश्वर्य, विलासिता और संपन्नता के कौन-से प्रतीक उसके पास नहीं थे।

जोधपुर अदालत में जब जज ने 25 अप्रैल को सजा सुनाई, तो वह ‘भगवानरूपा’ आसाराम बापू सिर पकड़ कर रोने लगा, जज से रहम की भीख मांगने लगा। वह भूल चुका था कि उसने नाबालिग कन्या से बलात्कार जैसा घिनौना अपराध किया था। सिर्फ बलात्कार ही नहीं, बापू ने एक भोले-भाले भक्त के विश्वास और आस्थाओं को भी चकनाचूर किया था। पाखंड धर्म का था और खिलवाड़ ‘नाबालिग देह’ के साथ किया गया! जिन चेहरों में हम ‘दैवीय छवियां’ देखते हैं, अंतत: वे ही राक्षस, दरिंदे साबित होते हैं। एक कुकर्म क्या पकड़ा गया कि बापू की करीब 10,000 करोड़ रुपए की संपदा और 19 देशों में 400 आश्रमों का ‘मायाजाल’ एकदम भुरभुराने लगा। चार करोड़ से ज्यादा भक्तों में से ज्यादातर का मोहभंग हो गया होगा! परत-दर-परत मामले खुलते चले गए। दुष्कर्म के कई मामले सामने आते गए, मानो वह अराजकता का कोई काला उदाहरण हो! आज वह ‘आधुनिक भगवान’ जोधपुर जेल में है और उस पर बलात्कारी होने का ठप्पा छप चुका है।

सितंबर, 2013 में गिरफ्तार होने के बाद राम जेठमलानी से लेकर किसी अन्य प्रख्यात नाम तक सभी ने आसाराम की पैरवी की, 12 बार जमानत के लिए आवेदन किया, लेकिन निष्कर्ष जेल का ही निकला। अब जब तक ‘बापू’ की सांसें चलेंगी, तब तक उसे जेल की सलाखों के पीछे ही रहना पड़ेगा। ऊपरी अदालत का रुख और फैसला क्या रहता है, हम नहीं कह सकते, लेकिन कानूनन अब वह ‘बलात्कारी’ है। इस संदर्भ में गुरमीत राम रहीम, बाबा रामपाल, इच्छाधारी भीमानंद, नारायण साई, स्वामी प्रेमानंद, स्वामी नित्यानंद, सच्चिदानंद गुरु आदि ऐसे बाबाओं, धर्मगुरुओं और संत-महात्माओं के नाम याद आते हैं, जो कमोबेश हिंदू धर्म पर ‘कलंक’ के समान हैं। इनमें से अधिकतर पर यौन अपराध, सेक्स रैकेट या उत्पीडऩ के साबित आरोप हैं।

आखिर इन कलंकित चेहरों पर परंपरा कब समाप्त होगी? यह परंपरा अंधभक्तों के कारण ही पनपती है और फिर आगे बढ़ती चली जाती है। इन्हें राजाश्रय भी प्राप्त होता रहा है। एक दौर था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रैली में भीड़ जुटाने के लिए आसाराम बापू के चेहरे का इस्तेमाल किया था। बापू के सान्निध्य में लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी सरीखे भाजपा नेता भी थे। आस्था उनकी भी थी। बाबा तब ‘बलात्कारी’ नहीं था, लिहाजा किसी राजनीतिक चेहरे को लेकर ओछी और घटिया राजनीति नहीं की जानी चाहिए। यह बाबा बलात्कारी है, अपराधी है, इलाज कराने आई कन्या के साथ ‘मुंह काला’ किया था, नतीजतन आज जेल में है।

बहरहाल फर्जी और ढोंगी बाबाओं के किस्से हमें सचेत कर रहे हैं। ये किस्से साफ बयां करते हैं कि ऐसी बाबागीरी हमारे देश में बहुत बढिय़ा धंधा है। कोई निवेश नहीं, कोई उत्पादन नहीं, कोई एजेंसियां नहीं, लेकिन अपने नकली व्यवहार से लाखों-करोड़ों भक्तों की फसल खड़ी की जा सकती है। उनके जरिए धन-संपदा के अंबार लगाए जा सकते हैं। राजनेता, रईस और सफेदपोश भी अनुयायी होंगे, लेकिन बाबा जब ‘बलात्कारी’, ‘दुराचारी’ बनने लगते हैं, तो उनकी जगह जेल ही है।

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