काशी हिन्दू विश्वविद्यालय – इस आज़ादी का सपना तो नहीं देखा था महामना ने 


संजय तिवारी

यह महामना मदनमोहन मालवीय की तपस्थली है। उनके सपनो की बगिया है। गांधी जी के सनातन भारत की आत्मा का प्रवाह लेकर बहाने वाली विद्यावाहिनी गंगा है। यह भारतीयता की भावभूमि तैयार करने वाली ज्ञान की यञशाला है। यह महज एक शिक्षापरिसर नहीं है। भारत की पहचान है। सनातन की स्थापना की कायर्शाला है। महामना की आत्मा इसमें आज भी इसलिए बसती है क्योकि इसकी स्थापना ही भारत और भारतीयता को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए की गयी है। इस परिसर को पिछले कुछ दिनों से किसी की नजर लग गयी है। कोई है जो साजिश रच रहा है। कोई है जो इस पवित्र परिसर को बदनाम भी कर रहा है और बर्बाद भी। जो भी है , वह न तो भारत वर्ष का हितैषी है और न ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का। उसे काशी के इस पावन परिसर की मस्ती और संस्कार पसंद नहीं हैं इसलिए वे शक्तियां रोज रोज कोई न कोई साजिश रचाने में लगी हैं। पिछले साल जो कुछ हुआ उसमे एक कर्मठ शिक्षक की बलि चढ़ गयी। प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी दोषी नहीं थे ,फिर भी उनको खूब बदनाम भी किया गया और उनको अपने पद से भी हाथ धोना पड़ा था। अब तो प्रो. त्रिपाठी नहीं है। फिर इस परिसर में वे कौन से तत्व हैं जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की तर्ज पर आजादी की मांग करने लगे हैं। किसकी सह है इनको। पिछले कुछ दिनों से बिड़ला और लालबहादुर शास्त्री हॉस्टल के बीच जो कुछ चल रहा है वह केवल उतना ही नहीं है जितना ऊपर से दिख रहा है।
दरअसल जब से प्रो. गिरीश त्रिपाठी के कार्यकाल में हुई घटनाओ की जांच रिपोर्ट आयी है उसी  समय से उन ताकतों को दिक्कत होने लगी है जिन्होंने बड़ी मुश्किल से बी एच यू को जे एन  यू वाली छाया में देखना शुरू किया था। अब जबकि यह प्रमाणित हो चुका कि  बी एच यू के उस बवाल में  जे एन  यू वालो का हाथ था , वे काफी बेचैन हो गए हैं।


क्या कहती है जांच की रिपोर्ट 
बीते साल बीएचयू में छेड़छाड़ की घटना के बाद हुए बवाल की न्यायिक जांच रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंप दी गई है। सूत्रों के मुताबिक न्यायमूर्ति वीके दीक्षित की समिति ने अपनी रिपोर्ट में पूर्व कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी को क्लीन चिट दी है। बीते 21 सितंबर को बीएचयू में छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना के बाद परिसर अशांत हो गया था। आगजनी, उपद्रव के साथ ही न्याय की मांग कर रही छात्राओं पर लाठीचार्ज की गूंज लखनऊ से लेकर दिल्ली तक पहुंची। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मामला छाया रहा। मामले की जांच के लिए बीएचयू प्रशासन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस वीके दीक्षित की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। न्यायमूर्ति दीक्षित द्वारा दी गई रिपोर्ट बीएचयू की ओर से मानव संसाधन मंत्रालय को भेज दी गई है। इस जांच रिपोर्ट के मुताबिक छात्रा के साथ छेड़छाड़ और बाद में हुई घटनाएं बीएचयू और तत्कालीन कुलपति को अस्थिर करने की साजिश के तहत की गईं। इसमें कुलपति की तरफ से कोई चूक नहीं हुई थी। अगर बाहरी लोगों का हस्तक्षेप नहीं होता तो आंतरिक रूप से इसका हल निकल सकता था। रिपोर्ट में राजनीतिक साजिश की ओर भी इशारा किया गया है। इसमें कहा गया है कि पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी बीएचयू के शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम थे। बीएचयू के पीआरओ डॉ. राजेश सिंह ने रिपोर्ट की गोपनीयता का हवाला देते हुए कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।
 
मैंने तो सच्चे मन से सेवा की : प्रो. त्रिपाठी 

प्रो. जीसी त्रिपाठी, पूर्व कुलपति बीएचयू एवं अध्यक्ष अर्थशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने कहा, ‘अभी मैंने कमेटी की रिपोर्ट देखी नहीं है इसलिए रिपोर्ट पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करना उचित प्रतीत नहीं होगा। रिपोर्ट के संबंध में जो बातें बताई जा रही हैं, उसे मैं शुरू से ही कहता आ रहा हूं। अगर ऐसा है तो सच सबके सामने आ गया है। मैंने बीएचयू को महामना की तपोभूमि और अपनी कर्मभूमि मानकर सच्चे मन से सेवा की।
 
प्रदेश सरकार के कार्यक्रम में संतो ने उठाया मुद्दा 

दरअसल यह मामला तब और संगीन हो गया जब प्रदेश सरकार के एक कार्यक्रम में संत समाज ने काशी की प्रतिष्ठा से इस मामले को जोड़ा कर रखा। यहाँ माता अन्नपूर्णा अन्न क्षेत्र द्वारा संचालित गुरुकुल में पिछले दिनों उपमुख्यमंत्री  केशव प्रसाद मौर्य और प्रदेश के तमाम मंत्रियों की मौजूदगी में एक बड़ी घटना हुई। बटुकों के उपनयन संस्कार और गरीब लड़कियों के सामूहिक विवाह समारोह के दौरान आशीर्वाद गोष्ठी में वाराणसी के तमाम सामाजिक संगठनों और संत समाज के लोगों ने प्रदेश सरकार के उप मुखिया केशव प्रसाद मौर्य के सामने यह मांग रख दी कि प्रदेश सरकार साल 2017 के सितंबर महीने में बीएचयू परिसर में हुई लाठीचार्ज और हिंसा की घटना के दोषियों का पर्दाफाश करे और उन्हें कड़ी सजा दिलाई जाए।

बाहरी लोगो ने कराई थी हिंसा 

यह मांग ऐसे ही नहीं उठी थी, बल्कि काशी के तमाम लोगों ने पहले भी इस बात का अंदेशा जताया था कि बीएचयू में सितंबर महीने में जिस तरह से प्रदर्शन हुए वह सारे देश में यूनिवर्सिटी की साख को गिराने और तत्कालीन कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी की छवि को बदनाम करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र था। साजिश की आशंका के पीछे बीएचयू के तमाम छात्रों, कर्मचारियों और वाराणसी के तमाम संगठनों की जो दलील थी, वह एक तरह से इस बात पर इशारा कर रही थीं कि हिन्दू विश्वविद्यालय में जो हुआ वह सिर्फ एक घटना के विरोध में हुआ प्रदर्शन नहीं था। दरअसल बीएचयू से जुड़े तमाम छात्रों का यह आरोप था कि वाराणसी में हुए प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र शामिल हुए थे। इसके अलावा तमाम लोगों ने इस आंदोलन को हाईजैक कर इसे हिंसक मोड़ दिया, जिसे रोकने के लिए प्रशासन को बल प्रयोग करना पड़ा।
बीएचयू के भेजे वह सारे पत्र छिपा लिये गए जिनमें किसी बड़ी साजिश का अंदेशा था
भले ही इस घटना के बाद देशव्यापी विरोध के बीच तत्कालीन कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी को छुट्टी पर भेजकर डैमेज कंट्रोल का प्रयास किया गया।  यह एक बड़ी गलती थी।  एक बड़े वर्ग ने यह जरूर कहा कि बीएचयू की यह सारी घटना प्रशासनिक नाकामी और किसी बड़ी राजनीतिक साजिश का परिणाम थी। वाराणसी के इस विरोध की वजह भी थी। दरअसल, कभी अपने विशिष्ट छात्र आंदोलन के लिए प्रख्यात रहे बीएचयू के छात्रसंघ के समय भी कभी ऐसा कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ था, जिसके बीच विश्वविद्यालय के गेट पर अनसेफ कैंपस का बोर्ड लगा दिया जाए। इसके अलावा कई लोगों का यह भी कहना था कि प्रशासन ने अपनी नाकामी को छिपाने के लिए कुलपति को बिना किसी जांच दोषी बता दिया, लेकिन नेपथ्य में बीएचयू के भेजे वह सारे पत्र छिपा लिये गए जिनमें हिन्दू विश्वविद्यालय में किसी बड़ी साजिश का अंदेशा जताया गया था। त्रिपाठी को ऐसे समय में परिसर से बहार कर देने से साजिश करने वालो को बहुत लाभ हुआ।

प्रशासन को कैसे नहीं थी जानकारी


दरअसल, काशी के लोगों के इस आरोप के पीछे कुछ चिट्ठियां और बेहद मजबूत दलीलें थीं। पहली दलील यह कि जब वाराणसी में पीएम का दौरा था तो उनके काफिले के रूट पर ही हो रहे प्रदर्शन की जानकारी प्रशासन को कैसे नहीं थी? दूसरी दलील यह कि क्लोज्ड कैंपस के बावजूद जिस बीएचयू में एक पब्लिक अस्पताल, पेट्रोल पंप, बड़ा सा मंदिर और कई महत्वपूर्ण रास्ते हैं क्या वहां कि सुरक्षा की एकमेव जिम्मेवारी सिर्फ विश्वविद्यालय के सुरक्षा गार्ड्स की ही थी? तीसरी दलील यह कि जिस विश्वविद्यालय के छात्रों ने कई बार हॉस्टल के किसी छात्र के बीमार होने पर कुलपति को बीएचयू के अस्पताल में उससे मिलने आते देखा था क्या उन्होंने सच में अपने घर पर किसी डेलीगेशन से मुलाकात नहीं की थी? इन सब के साथ एक सवाल और भी था कि क्या बीएचयू ने सच में प्रशासन को इस बात की जानकारी पहले नहीं दी थी कि यूनिवर्सिटी के सिंह द्वार पर हो रहे प्रदर्शनों के हिंसक हो जाने और पीएम के दौरे को प्रभावित करने जैसा होने की आशंका है?
प्रशासन को पहले खबर दी तो कुलपति दोषी कैसे
दलील का आधार खोजा गया तो पता चला कि बीएचयू प्रशासन ने 21 सिंतबर को बीएचयू में एक छात्रा के साथ छेड़खानी की घटना होने के बाद तत्काल 3 सुरक्षा गार्ड्स को बर्खास्त कर दिया था। इस संबंध में बीएचयू के तत्कालीन चीफ प्रॉक्टर ने पूर्व सैनिक कल्याण निगम समेत कुछ अन्य लोगों को चिट्ठी भी लिखी थी। विरोध प्रदर्शन के बीच विश्वविद्यालय ने प्रशासन को 22 सितंबर लिखी एक चिट्ठी में यह आशंका भी जताई कि इस प्रदर्शन में तमाम बाहरी लोग शामिल हुए हैं और इसे राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया जा रहा है। इस पत्र में विश्वविद्यालय ने यह भी लिखा कि प्रशासन ने प्रदर्शन कर रहे लोगों से बात करने की कोशिश की लेकिन बाहरी लोगों के दबाव में ऐसा हो नहीं सका। 22 सितंबर के इस पत्र में कुछ हथियारबंद लोगों के बीएचयू के प्रदर्शनों में शामिल होने की आशंका भी जताई गई थी, लेकिन फिर भी प्रशासन ने इस पर कोई अमल नहीं किया। खुद बीएचयू की घटना के लिए बनाई गई जांच समिति ने भी यह माना कि बीएचयू के तमाम अनुरोधों के बाद भी प्रशासन ने सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किये और इन सभी आधारों पर कुलपति की तारीफ करते उन्हें क्लीन चिट भी दे दी। यही नहीं जांच समिति ने खुद भी इस मामले में तमाम वामपंथी संगठनों और बाहरी छात्रों को साजिश रचने का जिम्मेदार माना। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में छात्रों को यह कहते भी सुना गया कि इस प्रदर्शन में बाहर के विश्वविद्यालय के तमाम छात्र शामिल हुए।

अब काशी से माफी मांगेगे ?
ऐसे में काशी के लोगों ने यह मांग रखी कि बीएचयू की घटना की साजिश का खुलासा कर दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए। पर दूसरी ओर सवाल यह भी है, कि क्या बीएचयू में जो हुआ उसके पीछे की वजह सिर्फ कुलपति और विश्वविद्यालय की छवि को धूमिल करना था? जिस मीडिया के एक धड़े ने मेरी मां और पिता के विश्वविद्यालय को बिना जांच के ही ‘बनारस हुड़दंग विश्वविद्यालय’ और ‘अनसेफ कैंपस’ की संज्ञा से नवाज दिया, क्या वह जस्टिस दीक्षित की कमिटी की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए अब बीएचयू के लोगों से माफी मांगेगा? साथ ही सबसे अहम सवाल यह कि क्या वामपंथी संगठनों ने सुनियोजित साजिश के तहत बीएचयू कुलपति को बदनाम करने की साजिश रच बीएचयू में एक प्रायोजित हिंसा कराई थी? और अगर जवाब ‘हां’ है तो क्या इतिहास का दण्ड विधान इन सब को एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय और महामना की पुण्यभूमि को बदनाम करने के अपराध से मुक्त कर सकेगा?

अब यह वीडिओ सोशल मीडिया में


अब एक वीडिओ वाइरल हो रहा है।  विडियो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय का है, जिसके बाहर कई छात्र-छात्राएं नारेबाजी कर रहे हैं। भले ही यह विरोध प्रदर्शन छात्रहित के नाम पर हो रहा हो लेकिन नारेबाजी की जो स्टाइल इस प्रदर्शन में दिख रही है उसे अमूमन  कश्मीर में अलगाववादियों के जलसों में ही सुना गया  है। प्रदर्शन में शामिल लोग संभवत: लेफ्ट विचारधारा के छात्र संगठनों से जुड़े हुए लगते हैं, वजह किसी चेहरे की पहचान नहीं बल्कि विरोध करने का तरीका है। दरअसल, महिला महाविद्यालय के बाहर हुए प्रदर्शनों का तरीका वैसा ही दिखा जैसा कि पिछले दिनों जेएनयू में हुए देश विरोधी प्रदर्शनों के दौरान देखने को मिला था। बीएचयू के इस विडियो में महिला महाविद्यालय के बाहर हाथों में डफली लिए तमाम छात्र आजादी मांग रहे हैं, तरीका वही है जो कि अक्सर कश्मीरी अलगाववादियों के जुलूस में देखने को मिलता है।

ये आजादी के नारे किसके लिए
बीएचयू में लगने वाले इन ‘आजादी’ वाले नारों को देखकर एक बार मेरे मन में एक आशंका उठानी स्वाभाविक है कि क्या बनारस हिंदू विश्वविद्यालय भी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के तरह उन छात्र संगठनों की गिरफ्त में आने लगा है जिन पर अक्सर देश विरोधी या किसी हिंदू देवी देवता का विरोध करने के आरोप लगते रहे हैं। इन सब से बड़ी चिंता यह कि जो प्रदर्शनकारी बीएचयू में आजादी का नारा लगा रहे थे, उनकी असल मांग थी क्या? कुछ लोगों का कहना था कि यह छात्र विश्वविद्यालय की प्रॉक्टर को हटाने की मांग कर रहे थे और कुछ ऐसा कह रहे हैं कि यह विरोध टीवी पर पिछले दिन दिखाई गई एक मीडिया रिपोर्ट के खिलाफ था।  प्रॉक्टर का इस्तीफा मांग रहे लोग किसी ‘आजादी गैंग’ की स्टाइल में नारे लगाकर किस पराधीनता को हटाने की मांग कर रहे थे? दूसरा प्रश्न यह कि बीएचयू में आजादी के लिए नारे लगा रहे कितनों ने प्रॉक्टर को हटाने के लिए कुलपति से मिलने की मांग की और उनके ना मिलने पर उनका विरोध किया? एक और सवाल यह कि प्रॉक्टर के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन में महिला महाविद्यालय के बाहर आजादी का नारा लगाए जाने की बात कुलपति कार्यालय तक पहुंच सकी या नहीं? अगर हां, तो विश्वविद्यालय ने शैक्षिक पठन-पाठन वाले किसी कार्यदिवस में इनके विरोध को ‘शैक्षिक कार्यों में व्यवधान’ का कारण माना या नहीं और अगर सूचना नहीं मिली तो क्या परिसर में हो रही किसी गतिविधि की जानकारी कुलपति के ऑफिस तक नहीं पहुंच रही है?
हो सकता है अतिश्योक्त सी हों आशंकाएं

यह जरूर हो सकता है कि ये  आशंकाएं जरा सी अतिश्योक्ति भावना की लगती हों, विश्वविद्यालय के उस भविष्य के प्रति आशंका यह है  जिसमें यहां कोई ‘आजादी गैंग’ पनपता दिख रहा है। अगर बीएचयू में संघ से जुड़े एक आदमी के कुलपति बनने पर इसे संघ का मिनी कार्यालय बताया जा सकता था तो क्या मैं यह सवाल किया जाना चाहिए कि  यहां जेएनयू में पढ़े और वहां पढ़ाए किसी कुलपति के आने के बाद इस पर किसी वामपंथी संगठन का कार्यालय होने का आरोप लगा दिया जाएगा? एक और बात यह कि अगर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में निकले संघ के पथसंचलन के लिए कुलपति को दोषी बताया जाता रहा है तो क्या वामपंथी संगठनों के आजादी वाले नारे के लिए जेएनयू से आए एक कुलपति को जिम्मेदार कहा जाएगा ?

कुलपति डॉ भटनागर ने लिया वायदा नहीं भड़केगी हिंसा


बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बवाल मामले में  पहली बार कुलपति ने खुद हंगामा करने वाले छात्रों से वार्ता की पहल की है। बीती रात की घटना के बाद परिसर में फैले तनाव के बीच बुधवार की सुबह वह गए हंगामा करने वाले छात्रों के बीच। काफी देर तक चली वार्ता के दौरान उन्होंने छात्रों की समस्या को जानने की कोशिश की। उनकी पूरी बात सुनने के बाद उन्होंने छात्रों से कहा कि उनकी समस्या दूर करना विश्वविद्यालय प्रशासन का काम है, पर यह रोज-रोज बवाल करने से नहीं होगा। कुलपति ने बातचीत में कहा कि छात्रों ने वादा किया है कि अब भविष्य में बीती रात जैसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी। इस बीच रात की घटना की जांच के लिए एक कमेटी का गठन भी कर दिया गया है।
ईंट-पत्थर से लेकर पेट्रोल व देसी बम तक चले


कुलपति का कार्यभार ग्रहण करने के बाद मीडिया से मुखातिब डॉ भटनागर ने कहा था कि वह हर समस्या का समाधान बातचीत से निकालेंगे। लेकिन अभी तक इसकी पहल दिखी नहीं थी। ऐसे में हाल के दिनों में परिसर में रोजाना हल्ला हंगामा ही हो रहा था। बीती रात छात्र गुट ऐसे भिड़े कि ईंट-पत्थर से लेकर पेट्रोल व देसी बम तक चले। पूरी रात पुलिस को चक्रमण करना पड़ा। इस दौरान पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के घायल होने की भी सूचना है। मंगलवार की रात एक बार फिर विश्वविद्यालय अशान्त हो गया। विश्वविद्यालय में अधिकारियों के चक्रमण के साथ पुलिस की पूरी रात हूटर बजता रहा। देर रात विश्वविद्यालय के बिड़ला और एलबीएस छात्रावास के छात्र आमने-सामने हो गए जिसके बाद जमकर ईंट-पत्थर तो चले ही साथ ही पेट्रोल बम का इस्तेमाल भी हुआ। दोनों छात्रावास के छात्र इतने आक्रोशित थे कि कई चक्र में पुलिस और प्रोक्टोरियल बोर्ड के समझाना छात्रों का उपद्रव सुबह करीब 4 बजे शांत हुआ। दरअसल मंगलवार की रात अचानक बढ़े इस बवाल के पीछे दो दिन पूर्व हुए एलबीएस के छात्र आशुतोष मौर्या के साथ चाकूबाजी की घटना को कारण बताया जा रहा है। इसके अलावा पिछले हफ्ते एलबीएस के सीनियर और बिड़ला हॉस्टल के जूनियर छात्रों के बीच मारपीट की घटना हुई थी। इन्ही बातों को लेकर बिड़ला और एलबीएस हॉस्टल के छात्रों के बीच मंगलवार की आधी रात अचानक ही पथराव शुरू हो गया। इस दौरान छात्रों ने एक-दूसरे के हॉस्टल पर पेट्रोल और देशी बम भी फेंके। पथराव में दो छात्र घायल हो गए। जिन्हें ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया। बीच-बीच में बम फूटने की भी आवाजें लगातार आती रहीं जिसकी वजह से कैंपस में काफी अराजकता का माहौल बना रहा। हालात यह है कि छात्र जमकर पत्थरबाजी और बमबाजी करते रहें और यूनिवर्सिटी प्रशासन और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। दोनों तरफ से एक दूसरे पर ईंट-पत्थर बरसाए जाते रहे। पुलिस जब तक विश्वविद्यालय परिसर में दाखिल होती छात्रों का उपद्रव बढ़ चुका था। एसपी सिटी सहित अन्य अधिकारियों के समझाने-बुझाने के बाद मामला सुबह 4 बजे शांत हुआ। फिलहाल विश्वविद्यालय की स्थिति शांतिपूर्ण मगर तनावग्रस्त बताई जा रही है। मौके पर आधा दर्जन थाने की फोर्स व पीएसी तैनात है।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *