बात सिर्फ कर्नाटक की हो

कटघरे में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनकी पांच साला कर्नाटक सरकार होनी चाहिए। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव है। जनादेश कांग्रेस सरकार के कार्यक्रमों के पक्ष या विपक्ष में दिया जाना है। सवाल बार-बार होना चाहिए कि 3500 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या क्यों की? कर्नाटक सरकार ने किसानों के कर्ज माफ क्यों नहीं किए और उनकी फसलों का बीमा क्यों नहीं किया ? किसानों का कर्ज माफ करने की परंपरा कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार ने शुरू की थी, जब 65-70 हजार करोड़ रुपए के कर्ज माफ किए गए थे। सिर्फ एक साल पुरानी उ. प्र. की योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी करीब 86 लाख किसानों के कर्ज माफ किए। भाजपा अब भी वायदा कर रही है कि कर्नाटक में सरकार बनी, तो कैबिनेट की पहली ही बैठक में किसानों की कर्ज माफी का फैसला लिया जाएगा।

कुछ और राज्यों की सरकारों ने भी कर्ज माफ कर किसानों को राहत दी है। बेशक, किसानों के मुद्दे पर कांग्रेस कितनी भी पैरोकारी करती रहे, लेकिन कर्नाटक में वह पिछड़ गई है। किसानों के अलावा, देश में दलित-उत्पीडऩ के जितने भी मामले होते हैं, उनका करीब 30 फीसदी कर्नाटक में ही क्यों होता रहा है ? जबकि, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का आरोप है कि संघ की मानसिकता दलित-विरोधी है। देश में दलित मारे और दबाए जा रहे हैं। राहुल गांधी को दलितों के लिए संघ द्वारा संचालित ‘सेवा भारतीÓ स्कूल शृंखला, ‘बनवासी कल्याण आश्रमÓ और ‘एकल विद्यालयÓ आदि की जानकारी नहीं है। यदि जानकारी होती, तो वह संघ को दलित-विरोधी करार न देते। चुनाव न तो संघ की मानसिकता पर है और न ही संघ चुनाव लड़ रहा है। सवाल राष्टï्रीय स्तर पर दलितों के साथ व्यवहार का भी नहीं है। यदि दलितों की बात करनी है, तो कर्नाटक की करीब 19 फीसदी दलित आबादी के संदर्भ में करें। दलित-उत्पीडऩ का औसत हम दे चुके हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने पांच साल तक शासन चलाया है। अब जवाबदेही भी उसी की है। राहुल गांधी और सिद्धारमैया को सटीक जवाब देने चाहिए। सिद्धारमैया की कंाग्रेस सरकार को यह भी जवाब देना पड़ेगा कि संघ-भाजपा के 24 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं क्यों और कैसे की गईं ? उनमें पीएफआई संगठन की क्या भूमिका थी ? यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि कर्नाटक के शिक्षित युवा सरकार के प्रति आक्रोश और गुस्से में क्यों हैं? जिस डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री रहते गांधी परिवार ने कभी बोलने नहीं दिया, राहुल गांधी सरकार के फैसलों के खिलाफ ट्वीट करते रहे, कैबिनेट के फैसलों को सार्वजनिक तौर पर फाड़ दिया जाता था, करीब 12 लाख करोड़ रुपए के घोटाले हुए, बैंकों के फ्रॉड उसी दौर में पनपने लगे थे, जो आज बेनकाब हो रहे है, आज उसी शख्स को कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस ने अपना ‘मुखौटाÓ और प्रवक्ता बनाया है। क्या ये मुद्दे कर्नाटक की पांच साला सरकार के आकलन का आधार हैं? पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. सिंह ने नोटबंदी और जीएसटी को गलत करार देते हुए विश्लेषण किया है कि उनसे देश की अर्थ व्यवस्था बर्बाद हो गई है। जब दुनिया में अर्थ व्यवस्था का बेहतर दौर है, तब भारत की अर्थ व्यवस्था डूब रही है। बैंकिंग फ्रॉड 1.1 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुके हैं। दो सवालों का कांग्रेस को जवाब देना चाहिए-भारत की करीब 155 लाख करोड़ रुपए की अर्थ व्यवस्था क्या देश की बर्बादी की सूचक है? क्या 1.1 लाख करोड़ रुपए के बैंकिंग फ्रॉड मोदी सरकार के चार साला कार्यकाल की ही देन हैं? दरअसल, मोदी सरकार को खुलासा कर देना चाहिए कि बैंकों के साथ धोखाधड़ी करने वालों को कब से कर्ज मिल रहे थे और वे उद्योगपति एनपीए होने के बावजूद बैंकों से कर्ज हासिल कर रहे थे। ऐसा खुलासा सभी को बेनकाब कर देगा कि फ्रॉड को समर्थन और सहयोग किसने दिया? पुन: एक सवाल करते हैं कि यह चुनाव केंद्र सरकार और लोकसभा के लिए हो रहा है या सिर्फ कर्नाटक राज्य की विधानसभा के लिए ? कर्नाटक का चुनाव वाकई प्रधानमंत्री मोदी बनाम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया नहीं है। ऐसा हो भी नहीं सकता। भाजपा के येदियुरप्पा भी मुख्यमंत्री रहे हैं और सिद्धारमैया भी निवर्तमान मुख्यमंत्री हैं। बहस उन दोनों के बीच होनी चाहिए थी, लेकिन कर्नाटक नेपथ्य में चला गया है और राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दे सामने हैं। फिर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अंतर क्या रहा? क्यों न दोनों तरह के चुनाव एक साथ कराए जाएं? उससे देश का खर्च भी बचेगा और व्यापक जनादेश मिलेगा।

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