खबर का असर:शासन से अनुमति लिए बगैर भर्ती की तो खैर नहीं- संयुक्त सचिव

खबर का असर:शासन से अनुमति लिए बगैर भर्ती की तो खैर नहीं- संयुक्त सचिव

शासन ने होमगार्ड स्वयंसेवकों की भर्ती रद्द की

शासन ने शुरू की चयन समिति के सदस्यों एवं पर्यवेक्षणीय अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी

अब शासन से अनुमति लिए बिना भर्ती की तो खैर नहीं: सत्येन्द्र कुमार सिंह

डीआईजी,इलाहाबाद एस सी उपाध्याय को सस्पेंड क्यों नहीं किया गया? 

डीआईजी,मुख्यालय एस के सिंह को क्यों बख्श दिया गया?

संजय पुरबिया

लखनऊ।

होमगार्ड विभाग के अफसरान होश में आ जाएं। अपने को शासन से बड़ा समझने का ख्वाब देखना बंद कर दें। वर्ना आपलोगों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई होगी,जो अभी तक नहीं हुई। ऐसा इसलिए होने जा रहा है क्योंकि मुख्यालय पर तैनात कुछ दंभी अफसर भाजपा सरकार में अपने को बड़ा समझ कर इलाहाबाद भर्ती निकाल दी। इसके लिए उन्होंने पंचम तल हो या फिर बापू भवन के अफसर,किसी से ये पूछने की जहमत नहीं उठाई कि हमलोग अवैतनिक होमगार्डों की भर्ती निकालने जा रहे हैं। लेकिन,अब ऐसा नहीं होगा। शासन पूरी तरह से सख्ती के मूड में है और अपनी सकारात्मक ताकत का अहसास मुख्यालय पर बैठे डीजी और डीआईजी को दिखाने के मूड में है। ऐसा कल 15 मई को संयुक्त सचिव सत्येन्द्र कुमार सिंह के एक गोपनीय पत्र से होता दिख रहा है। आप यूं कह सकते हैं कि होमगार्ड मुख्यालय के इन अफसरों ने अपने आप को तुर्रमखान समझ लिया और आव देखा न ताव निकाल दी भर्ती और उसमें करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा कर दिया। इलाहाबाद के कमांडेंट प्रियव्रत सिंह को सस्पेंड कर डीआईजी एस सी उपाध्याय को मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया है।


बता दें कि द संडे व्यूज़इंडिया एक्सप्रेस न्यूज़ डॉट कॉम ने सबसे पहले खुलासा किया था कि इलाहाबाद में हुए 70 होमगार्डों की भर्ती शासन से बिना अनुमति लिए डीजी सूर्य कुमार शुक्ला एवं डीआईजी, मुख्यालय एस के सिंह के निर्देश पर इलाहाबाद,होमगार्ड विभाग के डीआईजी एस सी उपाध्याय एवं कमांडेंट प्रियव्रत सिंह ने करा दी थी। इस बात का खुलासा होने के बाद प्रमुख सचिव,होमगार्ड ने मामले को गंभीरता से लिया और होमगार्ड विभाग के तेज तर्रार अधिकारी डीआईजी,फैजाबाद शतर चंद्र त्रिपाठी एवं एसएसओ सुनील कुमार को जांच की जिम्मेदारी सौंपी। श्री त्रिपाठी की जांच रिपोर्ट के आधार पर इतने बड़े घोटाले का खुलासा हुआ। इस मामले में कमांडेंट,इलाहाबाद को सस्पेंड कर दिया गया और डीआईजी,इलाहाबाद को मुख्यालय से सम्बद्ध कर दिया गया।

यहां सवाल यह है कि आखिर इस भर्ती में हुए फ्राड में असली भूमिका निभाने वाले डीआईजी,मुख्यालय एस के सिंह को क्यों बख्श दिया गया? क्योंकि,इन्होंने ही उस एजेंसी को काम सौंपा था जिसने दौड़ में जीप लगाने का काम किया था। पूरी सेटिंग जीप में की गई होगी तभी तो जो दौड़ में सक्षम नहीं था वो भी पास हो गया। शासन के अफसरों ने बताया कि इसी एजेंसी के माध्यम से डीजी और डीआईजी पूरे प्रदेश में होमगार्डों की भर्ती कराना चाहते थें ताकि उनकी बड़ी साजिश कामयाब हो जाए लेकिन शासन ने इस फ्राड का खुलासा कर इनलोगों के नापाक मंसूबों को ध्वस्त कर दिया। बता दें कि जवानों के पद पर भर्ती के लिए आवेदन पत्र ऑनलाइन न मंगाकर सिर्फ पोर्टल पंजीकरण कराया गया और सारे आवेदन सीधे जमा करा लिए गए।आवेदनों पर न तो आवेदकों का हस्ताक्षर है और न ही अंगूठे का निशान। आवेदन पत्र के साथ शुल्क जमा न कराते हुए पोस्टल आर्डर के माध्यम से शुल्क लिया गया।

इतना ही नहीं,चयनित अभ्यर्थियों की लंबाई एवं सीने की माप के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन न करके सिर्फ चिकित्सा अधिकारी से ही मेडिकल करा लिया गया। इसी फर्जी एजेंसी के माध्यम से इस विभाग में 6000 पदों पर प्रस्तावित भर्ती प्रक्रिया कराने की रणनीति थी। जरा सोचिए,क्या एक कमांडेंट की इतनी हैसियत है कि वो अपने दम पर इतनी बड़ी और फर्जी तरीके से जवानों की भर्ती कर सकता है। आपका जवाब भी मेरी तरह ना ही होगा, तो फिर इस मामले में शामिल बड़े मगरमच्छ अभी तक बचे क्यों हैं? इस मामले में शामिल डीआईजी,इलाहाबाद एस सी उपाध्याय को मुख्यालय से सम्बद्ध क्यों किया गया? उन्हें भी कमांडेंट के साथ सस्पेंड क्यों नहीं किया गया?
खैर,संयुक्त सचिव सत्येन्द्र कुमार सिंह के इस पत्र ने हड़कम्प मचा दिया है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि इलाहाबाद में होमगार्डों के रिक्त पदों पर गत माह में की गई भर्ती में पाई गई अनियमितताओं को देखते हुए शासन ने होमगार्ड स्वयंसेवकों के चयन को निरस्त कर दिया है। साथ ही चयन समिति के अध्यक्ष को निलंबित कर अन्य सदस्यों तथा पर्यवेक्षणीय अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। मृतक आश्रितों की भर्ती छोड़कर शासन की अनुमति के बिना किसी प्रकार की कोई भर्ती न की जाए।
मुख्यालय के अफसरों के मुताबिक छोटे अखबार एवं पंप्लेट द संडे व्यूज़ ने वो धमाल मचाया कि इस विभाग के भ्रष्ट अफसरों की चूलें हिली हुई है। बड़े अफसरों ने चारो तरफ अपने दूत लगा दिए हैं कि किसी तरह से द संडे व्यूज़ के छोटे पत्रकार को मैनेज करो…। मेरा अफसरों से यही सवाल है कि आपलोगों की नजरों में मैनेज शब्द की परिभाषा क्या हैं…। बता दूं कि कलमकारों को मैनेज करने वाले खुद ही निपट जाते हैं जनाब…

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