कर्नाटक में कांग्रेस- जेडीएस इस बार लंबा पारी खेलेगी !

ब्यूरो
लखनऊ।

कर्नाटक चुनाव में भले ही भाजपा बड़ी जीत दर्ज की लेकिन सरकार कांग्रेस एवं जेडीएस की बन रही है। लेकिन, चुनाव के बाद अचानक बने इस गठबंधन की सरकार की राह आसान नहीं होगी। सरकार को कई भीतरी और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसका असर राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के रूप में भी सामने आ सकता है।  कांग्रेस और जेडीएस ने विधानसभा चुनाव एक- दूसरे के खिलाफ लड़े हैं। दोनों ने अलग- अलग वायदे जनता से किए हैं। जैसा कि कांग्रेस ने कहा है कि वह बाहर से ही सरकार का समर्थन करेगी, ऐसे में उसके लिए दोतरफ ा चुनौती होगी।


एक तरफ उसके ऊपर जेडीएस सरकार के कामकाज के भले- बुरे की नैतिक जिम्मेदारी होगी दूसरी तरफ वादे पूरे करने का दबाव भी पड़ेगा, क्योंकि उसके समर्थन से ही सरकार चल रही है। लेकिन बाहर से समर्थन देकर क्या वह अपने वायदे पूरे करा पाएगी। कर्नाटक में तोडफ़ ोड़ की जो अटकलें पिछले तीन- चार दिनों से चल रही थी, उनके आगे बंद होने की उम्मीद कम है। कांग्रेस, जेडीएस की साझा सरकार बन जाने के बावजूद तोडफ़ ोड़ से इंकार नहीं किया जा सकता।
वैसे भी क्षेत्रीय राजनीति के कारण दोनों दलों में इस गठबंधन को लेकर कई विधायकों में सहमति नहीं है। ये नाराज विधायक भी खुद भी इन अपनी पार्टियों का दामन छोड़ सकते हैं। इससे संख्या बल की समस्या सरकार के सामने खड़ी हो सकती है। सवाल यह भी है कि क्या भाजपा इस शिकस्त को चुपचाप सहन कर बैठी रहेगी?

थोड़ा पीछे चलें। कांग्रेस और जेडीएस के बीच गठबंधन की सरकार पहले भी बन चुकी है। लेकिन वह ज्यादा समय तक नहीं चली। 2004 में जब दोनों दलों की सरकार बनी थी तो जेडीएस ने कई शर्तें जोड़ दी थी और कांग्रेस को अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाने पर बाध्य कर दिया था। धरम सिंह तब मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन डेढ़ साल के बाद ही कुमार स्वामी अलग हो गए। कुछ दिन बाद उन्होंने सत्ता की साझीदारी में भाजपा के समर्थन से अपनी सरकार बनाई और खुद मुख्यमंत्री बने। लेकिन अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो वे सत्ता सौंपने से मुकर गए। तब राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। पर कुछ दिन बाद ही वे भाजपा को समर्थन देने को तैयार हो गए। तब येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने थे। सवाल यह भी उठता है कि क्या जेडीएस की फि तरत अब बदल गई है?

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