योगी राज में आत्माएं धरती पर आकर रच रही हैं करोड़ों की जमीन हड़पने की साजिश

डीएम की बेबसी : चकबंदी,राजस्व विभाग के अफसरों ने बनाया फर्जी दस्तावेज,रखा अभिलेखागार में

फर्जी दस्तावेज बनाने में भू माफियाओं का साथ दिया राजस्व,चकबंदी,निबंधन एवं कलेक्ट्रेट के अभिलेखागार विभाग के अफसर

हाईकोर्ट एडवोकेट की सगी बहन की जमीन हथियाने के लिए माफियाओं ने की करोड़ों की डिमांड

एडवोकेट के घर की हो रही है रेकी, शासन-प्रशासन मौन

संजय पुरबिया
लखनऊ।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान से ही खबर की शुरूआत करते हैं। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में अपराधियों की जगह जेल की सलाखों में है। माफियागिरी अब किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी…। सुनकर अच्छा लगा,लोग अपने को महफूज महसूस करने लगे लेकिन क्या योगी जी के कथन धरातल पर सही होते दिख रहे हैं। अपराध बेलगाम है,भू-माफिया आज भी पुराने ढर्रे पर दबंगई से लाचार लोगों की जमीनें हड़प रहे हैं। ऐसा नहीं कि इस बात की जानकारी शासन-प्रशासन के अफसरानों को ना हो,सब कुछ इन्हीं लोगों की शह और इशारों पर हो रहा है। इसके एवज में भू-माफिया उनकी मुरादें पूरी करते चले आ रहे हैं। आपको यूपी की धड़कन लखनऊ की बात बताते हैं,जहां स्वयं सीएम विराजमान हैं, पूरी सरकार है और नौकरशाहों का हुजूम लेकिन इसी शहर में हाईकोर्ट एडवोकेट की सगी बहन की करोड़ों की जमीन के फर्जी कागजात बना डाले गए और उसे बेचने की तैयारियां भी शुरू कर दी गई। चौंकाने वाली बात ये है कि इस खेल में भू-माफियाओं के साथ फर्जी दस्तावेज बनाने की साजिश चकबंदी विभाग के अफसरों ने रची। कलेक्ट्रेट में जहां डीएम कौशल राज बैठते हैं वहीं बगल के कमरे में चकबंदी विभाग के अफसरों ने ये कारनामा कर दिखाया।

सवाल यह है कि करोड़ों की जमीन के बनाए गए फर्जी दस्तावेज आखिर अभिलेखागार में पहुंचा कैसे? सवाल यह भी है कि यहां रखे गऐ दस्तावेज में ऐसे लोगों के अंगूठे लगाए गए हैं जो इस दुनिया में हैं ही नहीं? जब पूर्व के जमीन मालिक सालों पहले मर चुके हैं तो उनसे फर्जीवाड़ा करने वाले भू-माफियाओं ने सुलनामा कैसे कर लिया? क्या भू-माफियाओं के बुलावे पर सभी आत्माएं नरक से धरती पर आई और इनसे सुलहनामा और अपने अंगूठे का निशान लगाकर वापस चली गई? खैर,इस फर्जीवाड़े की भनक जब असली जमीन मालिक श्रीमती किरन सक्सेना विधवा के एडवोकेट भाई प्रदीप कुमार श्रीवास्तव को लगी तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने आनन-फानन में इसकी सूचना जिलाधिकारी कौशलराज को दी और भू-माफियाओं से कानूनी राह अपनाकर लडऩे का मन बनाया। इस बात की भनक लगते ही पर्दे के पीछे से खेल खेलने वाले पूर्वांचल के माफिया खुलकर सामने आ गए। भू-माफियाओं ने अपने गुर्गो से एडवोकेट प्रदीप श्रीवास्तव से करोड़ों के रकम की मांग की जिसे उन्होंने मना कर दिया। इस पर बौखलाए माफियाओं ने एडवोकेट के घर की रेकी भी की। इस बात की जानकारी शासन- प्रशासन को दी गई लेकिन एडवोकेट के परिवार की सुरक्षा के लिए कोई इंतजमात नहीं किए गए। इस मामले से प्रदीप श्रीवास्तव का परिवार खौफजदा है लेकिन अपने हक की लड़ाई लडऩे के लिए सभी लामबंद हो गए हैं। यही कहा जाए कि डीएम कौशलराज के राज में भू-माफिया बेखौफ हैं और ईमानदार इंसान खौफजदा…।

शीपिंग कारपोरेशन में चीफ इंजीनियर रहे स्व. राजेन्द्र कुमार सक्सेना की पत्नी श्रीमती किरन सक्सेना जो वर्तमान में पी-66 ग्राउंड फ्लोर स्वामीनगर, नार्थ पीएस हौजखाना,नई दिल्ली में रहती हैं। इनके भाई प्रदीप कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट, हाईकोर्ट बी-5-1 वाल्दा कालोनी,निशातगंज में निवास करते हैं। श्रीमती किरन सक्सेना अक्सर अपने भाई के पास आती-जाती रहती हैं, इनके नाम से लगभग 11 बीघा जमीन फैजाबाद रोड पर है। खसरा नंबर188,189,190, 191 एवं 192 ग्राम उत्तरधौना, परगना,तहसील व जिला लखनऊ में इनकी जमीन है। श्रीमती रामकला पत्नी स्व. हरीलाल ने खसरा संख्या 188 कोश्रीमती रूकमिन पुत्र हेमराज पत्नी कल्लूराम को 11 मार्च 1990 को बेच दिया एवं उसका कब्जा व दखल मालिकाना भी इनके नाम से करा दिया। उसके बाद 26 दिसंबर 1990 को श्रीमती रूकमिन पुत्री हेमराज पत्नी कल्लूराम ने इसी जमीन को राजेन्द्र कुमार सक्सेना पुत्र काशी राम सक्सेना को बेच दिया एवं उसका कब्जा व मालिकाना हक राजेन्द्र कुमार सक्सेना को दे दिया। राजेन्द्र कुमार सक्सेना की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी पत्नी व पुत्र विवेक सक्सेना को उक्त संपत्ति पर काबिज दाखिल हैं व दर्ज खातेदार हैं। इसी तरह, खसरा संख्या 189 जो शेर ङ्क्षसंह पुत्र झाझनला द्वारा श्रीमती रूकमिन पुत्री हेमराज पत्नी कल्लूराम को 15 दिसंबर 1990 को बेच दिया गया एवं उसका कब्जा व दखल मालिकाना भी उसे करा दिया। बाद में श्रीमती रूकमिन ने उक्त संपत्ति को राजेन्द्र कुमार सक्सेना को 26 दिसंबर 1990 को बेच दिया। खसरा संख्या 190 तुला पुत्र पांचू उपरोक्त खाते की जमीन रकबा 2 बीघा 14 मार्च 1988 एवं 18 मार्च 1988 को राजेन्द्र कुमार सक्सेना को बेच दी।

तुला पुत्र पांचू ने अपने उपरोक्त खाते की जमीन रकबा 1 बीघा 11 बिसवा,8 बिस्वांसी को 11 सितंबर 1989 व 14 सितंबर 1989 को राजेन्द्र कुमार सक्सेना को बेच दिया। खसरा संख्या 191 को रामस्वरूप पुत्र द्वारिका ने शेर सिंह पुत्र झाझनलाल को 12 मई 1988 में बेच दिया। बाद में शेर सिंह पुत्र झाझनलाल ने उक्त संपत्ति को श्रीमती रूकमिन पुत्री हेमराज पत्नी कल्लूराम को 15 दिसंबर 1990 में बेच दिया। उसके बाद रूकमिन ने 18 जुलाई 1996 में उक्त जमीन को राजेन्द्र कुमार सक्सेना को बेच दिया। खसरा संख्या 192 को राम झरोख,रामनरेश,राम सुमेर,संतोष पुत्र स्व. ईश्वरदीन निवासी ग्राम उत्तरधौंना परगना तहसील व जिला लखनऊ ने ब्रम्हा पुत्र खिम्मन को 5 जनवरी 1990 को बेच दिया गया। बाद में ब्रम्हा पुत्र खिम्मन ने उक्त संपत्ति को राजेन्द्र कुमार सक्सेना को 26 दिसंबर 1990 को बेच दिया। सभी खसरा नंबर में स्पष्टï तौर पर लिखा है कि इस पर राजेन्द्र कुमार सक्सेना पुत्र काशी राम सक्सेना का कब्जा व दखल मालिकाना हक रहेगा। इनकी मृत्यु के बाद उनकी विधिक उत्तराधिकारी पत्नी श्रीमती किरन सक्सेना एवं पुत्र विवेक सक्सेना उक्त संपत्ति पर काबिज, दाखिल व खातेदार हैं।

अब आते हैं असल मुद्दे पर। फैजाबाद रोड पर करोड़ों की जमीन पर भू-माफियाओं एवं पूर्वांचल के माफियाओं की नजरें गड़ी हुई थी। इनलोगों ने सोचा कि राजेन्द्र कुमार सक्सेना की पत्नी अक्सर दिल्ली में रहती हैं और बेटा विदेश में है,इसलिए इसे हथिया लिया जाए। जमीन को हड़पने की साजिश रची गई लेकिन ये लोग भूल गए कि किरन सक्सेना के भाई प्रदीप कुमार श्रीवास्तव लखनऊ में हाईकोर्ट के जाने-माने एडवोकेट हैं। डीएम कौशलराज को लिखे गए पत्र में श्रीमती किरन सक्सेना ने जिक्र किया है कि भू-माफिया जुबेर अहमद पुत्र मकसूद अहमद निवासी नानपारा बहराइच, वर्तमान पता (डालीगंज) लखनऊ, कांता पुत्र शिवनंदन,विष्णु प्रताप एवं रघुराज दोनों पुत्र छोटेलाल निवासी ग्राम अटेसुआ, तहसील बख्शी का तालाब, लखनऊ ने राजस्व कर्मचारियों, चकबंदी एवं कलेक्ट्रेट-लखनऊ स्थित अभिलेखागार के कर्मचारियों की मिलीभगत से उक्त सभी खसरा नंबर का फर्जी दस्तावेज बनवा कर कब्जा करने की फिराम में हैं। इस पत्र को डीएम कौशलराज ने गंभीरता से नहीं लिया है।


अब आपलोगों को बताते हैं कि करोड़ों की इस जमीन पर भू-माफियाओं ने किस तरह से फर्जीवाड़ा किया है जो शायद भ्रष्टï हो चुके शासन और प्रशासन के तथाकथित अफसरानों को नजर नहीं आ रहा है। फर्जी कागजात तैयार कराने वालों के कहने पर 21 दिसंबर 1988 को बी.एन. पाण्डेय उप संचालक चकबंदी,कलेक्ट्रेट ने कामता बनाम पांचू आदि के नाम से सुलहनामे के कागजात बनाए हैं। 9 फरवरी 1989 को श्री पाण्डेय ने आदेश दिया कि कामता को भूमिधर बना दिया गया है और उसमें से पांचू आदि का नाम काट दिया गया। बता दें कि पांचू की 14 मार्च1988 से पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। 14 मार्च 1988 को पांचू के पुत्र तुला ने उक्त वाद की संपत्ति का बैनामा राजेन्द्र कुमार सक्सेना पुत्र काशीराम सक्सेना के पक्ष में कर दिया था जबकि सुलहनामा में 21 दिसंबर 1988 को पांचू का अंगूठा लगाकर सुलहनामा दिखा दिया गया। सवाल यह है कि जब पांचू
की मृत्यु 14 मार्च 1988 से पूर्व हो चुकी थी तो वे अंगूठा लगाने कहां से आ गए? क्या वे स्वर्ग के रास्ते अपना अंगूठा लगाने धरती पर विराजे थे? फर्जीवाड़ा करने वालों ने मरे हुए व्यक्ति का अंगूठा लगाकर मरे हुए व्यक्ति की शिनाख्त करके अधिकारियों की मिलीभगत से सही दिखाकर फर्जी आदेश बनवा लिया।
इसी वाद में रामस्वरूप विपक्षी संख्या 2 में 12 मई 1988 को अपनी वादग्रस्त संपत्ति का बैनामा शेरङ्क्षसह पुत्र झांझनलाल को कर दिया था। शेरसिंह ने 15 दिसंबर 1990 को रूकमिन पत्नी कल्लूराम को बैनामा कर दिया था। उसके बाद रुकमिन ने 18
जुलाई 1996 को राजेन्द्र कुमार सक्सेना को उक्त जमीन विक्रय कर दिया। जब रामस्वरूप ने 12 मई 1988 को अपनी वादग्रस्त संपत्ति को बेच दी थी तो 21 दिसंबर 1988 को सुलहनामा करने का कोई आधार ही नहीं था।

मतलब साफ है, रामस्वरूप का फर्जी अंगूठा लगाकर कांता ने फर्जीवाड़ा किया है। कांता ने उक्त जमीन को फर्जी तरीके से अपने नाम करा लिया। सवाल यह भी है कि यदि सुलहनामा सही है तो उसे कायदे से 1989 में ही अपने नाम से चढ़वा लेना चाहिए था? उसने इतना लंबा वक्त क्यो लगाया? कांता ने न तो जमीन अपने नाम कराया और ना ही कब्जा लिया जबकि कांता अभी भी जीवित हैं। सवाल यह भी बनता है कि आखिर इतने सालों बाद कांता ने वर्ष 2019 में दरख्वास्त क्यों दिया?
अब खाता संख्या 188 व 192 की बात करते हैं। रमकला पत्नी स्व. हरिलाल नं 1 सितंबर 1990 को अपनी संपत्ति बेच दी थी। इसने भी अपने जीवनकाल में किसी सुलहनामे पर अंगूठा नहीं लगाया। फर्जी दस्तावेज लगाने वालों की मानें तो रमकला ने 27 जनवरी 1989 को सुलहनामा पर अंगूठा लगायी है। बैनामे पर लगे और सुलहनामे में लगे अंगूठा में जमीन-आसमान का अंतर है। किसी एजेंसी से इसकी जांच करा ली जाए सच्चाई सामने आ जाएगी क्योंकि इंसान के हस्ताक्षर एक बन सकते हैं लेकिन ऊंगलियों के निशान कभी धोखा नहीं दे सकते…। इसी तरह, ईश्वरदीन की मृत्यु भी 1989 के पहले हो चुकी है लेकिन उसका भी अंगूठा सुलहनामे में लगाया गया है। इतना ही नहीं, ईश्वरदीन के लड़के ने 5 जनवरी 1990 को ब्रम्हा पुत्र खेम्मन के नाम उक्त संपत्ति का बैनामा कर दिया था एवं 26 दिसंबर 1990 को ब्रम्हा द्वारा राजेन्द्र कुमार सक्सेना के पक्ष में बैनामा किया जा चुका था। यहां भी ईश्वरदीन का फर्जी अंगूठा लगा दिया गया।

इस फर्जीवाड़े की भनक श्रीमती किरन सक्सेना के भाई एडवोकेट प्रदीप कुमार श्रीवास्तव को लगी तो उन्होंने विधिक कार्यवाही शुरू कर दी। विधिक कार्यवाही होते ही फर्जीवाड़ा करने वालों में हड़कम्प मच गया। प्रदीप श्रीवास्तव ने बताया कि उनके पास उक्त जमीन से हटने लिए पूर्वांचल क माफियाओं की तरफ से पूरे परिवार को जान से मारने एवं करोड़ों की फिरौती मांगी जाने लगी। मेरे मना करने के बाद बाल्दा कालोनी,निशातगंज स्थित मेरे आवास की रेकी की जा रही है। यानि,भू-माफिया तो सिर्फ मोहरे हैं असली खेल तो पूर्वांचल में बैठा माफिया खेल रहा है।

आखिर में मेरा यही सवाल है कि जब सभी ने 1989 में समझौता कर लिया था तो कांता,मकसूद एवं छोटेलाल ने अभी तक दस्तावेजों में अपना नाम न चढ़वाया और ना ही उस जमीन पर कब्जा लिया,आखिर क्यों? सीधी बात है कि डीएम कौशलराज के नाक के नीचे कलेक्ट्रेट परिसर में बने कलेक्ट्रेट कर्मचारियों, राजस्व विभाग,चकबंदी विभाग,निबंधन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से करोड़ों की जमीन हथियाने का फर्जीवाड़ा ख्ेाला जा रहा है। चौंकाने वाली बात तो ये है कि चकबंदी विभाग के अभिलेखागार विभाग में ये फर्जी दस्तावेज पहुंचे कैसे ?

ये तो एक बानगी है यदि जांच करा ली जाए तो ऐसे न जाने कितने फर्जी दस्तावेज मिलेंगे जिनके दम पर भू-माफियाओं ने शरीफ लोगों की जमीनों को कब्जिया लिया होगा और इसके एवज में इन विभागों के अफसर करोड़पति बन गए होंगे। योगी सरकार में भ्रष्टïाचार और माफियाराज खत्म करने की बातें सिर्फ एक दिनों के लिए अखबार और चैनलों पर सुर्खियां बनती हैं लेकिन हकीकत ये है कि भ्रष्टïाचार न तो रूका है और ना ही रूकेगा क्योंकि शासन और प्रशासन की कुर्सियों पर बैठे तथाकथित अफसरों पर ना तो सरकार का खौफ है और ना ही नौकरशाहों की…। प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि जब एडवोकेट एवं उनके परिजन सुरक्षित नहीं रहेंगे तो सूबे के आम लोगों के सुरक्षा की बेमानी सी लगती है। जहां तक डीएम कौशल राज की बात है तो हम सभी को उम्मीद है कि उनके स्तर से न्याय मिलेगा। अब देखना है कि डीएम कौशलराज के राज में एक विधवा, पुत्र जो विदेश में नौकरी कर रहा है, एक होईकोर्ट के एडवोकेट को न्याय मिलता है या फिर…

लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व संयुक्त मंत्री राजेश दूबे (रज्जू दूबे) ने बताया कि मंगलवार को डीडीसी की कोर्ट में फैजाबाद रोड पर स्थित श्रीमती किरन सक्सेना की करोड़ों की जमीन की सुनवाई हुई जिसमें डीडीसी द्वारा फर्जी सुलहनामे के आधार पर 9फरवरी 1989 के हुए आदेश स्थगित कर दिए हैं।

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