डीआईजी साहेब, दो माह से मानसिक तनाव में जी रहे अफसर को दिला पाएंगे सम्मान ?

ईमानदार पीसीएस अफसर को बेइज्जत करने वाली महिला एसआई पर डीआईजी की दरियादिली

डीआईजी ने दबा दी जांच रिपोर्ट, घटना के दरम्यान क्यों नहीं किया महिला एसआई को निलंबित?

नहीं मिलेगा इंसाफ तो अनुसूचित जाति,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत करेंगे कार्रवाई :सुनील कुमार

संजय पुरबिया
लखनऊ।

एक पीसीएस अफसर को जब उसके साथ काम करने वाली महिला एसआई खेल के मैदान में सार्वजनिक तौर पर बेइज्जत करे तो विभाग के विभागाध्यक्ष को क्या कार्रवाई करना चाहिए? क्या उस मामले में जांच बिठाना चाहिए या फिर उसी समय महिला एसआई को निलंबित कर देना चाहिए? सवाल सीधा है। लेकिन, कोई कार्रवाई न करना ये साबित करता है कि आज भी यूपी में पीसीएस अफसरों के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की भूख प्रबल है। कुछ ऐसा ही मामला होमगार्ड विभाग में देखने को मिला। 12 अपै्रल को होमगार्ड मुख्यालय पर राज्य स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। रस्साकसी मैच के दौरान एक महिला एसआई (बीओ) नियम के विपरित खिलाडिय़ों के नजदीक जाकर सहयोग कर रही थी। खेलकूद कमेटी के अध्यक्ष का निर्देश था कि खेल के दौरान बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है। इस पर सीनियर स्टाफ आफिसर सुनील कुमार ने महिला बीओ को माईक से बार-बार बाहर जाने का निर्देश दिया लेकिन उसने बात नहीं मानी, उल्टे अपशब्दों का इस्तेमाल करने लगी। एक दिन पूर्व भी महिला बीओ ने कमांडेंट शैलेन्द्र प्रताप सिंह के साथ ग्राउंड पर बदतमीजी एवं घोर अनुशासनहीनता की थी।

चौंकाने वाली बात यह है कि महिला बीओ ने दो दिनों में अपने दो सीनियर अफसरों के साथ बदतमीजी की और इसकी जानकारी विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्य कुमार शुक्ला को थी लेकिन उन्होंने अभद्रता करने वाली महिला बीओ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। डीजी ने इस मामले की जांच डीआईजी एस. के. सिंह को सौंप दी। लगभग दो माह होने को है लेकिन डीआईजी ने अभी तक विभागाध्यक्ष को अपनी जांच रिपोर्ट नहीं सौंपी। आखिर डीआईजी का इतने लंबे समय तक जांच को दबाकर रखने के पीछे मकसद क्या है? जब एक जूनियर अपने अफसर के साथ सार्वजनिक तौर पर अभद्रता करती है तो तत्काल उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई करनी चाहिए , उसके बाद जांच की प्रक्रिया चलनी चाहिए। लेकिन इसमें ऐसा क्यों नहीं किया गया? इस मामले में उस अफसर का भी बयान लिया गया जिनकी कोई गल्ती है ही नहीं। क्या अफसरों ने कोई गुनाह किया है? दो माह से मानसिक तनाव व दबाव में जी रहे अफसर को क्या डीआईजी पहले वाली सामाजिक प्रतिष्ठïा दिला पाएंगे? जब सारे सीनियर अफसर बयान दे रहे हैं कि महिला बीओ की गल्ती है तो फिर जांच बिठाने की क्या जरूरत थी? कहीं महिला बीओ को आगे करके विभाग का कोई अफसर साजिश तो नहीं कर रहा है? ये तमाम सवाल ये साबित करते हैं कि अफसरों के बीच पनपती कुर्सी की भूख इस कदर बढ़ती जा रही है कि वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।

जेल रोड पर बने होमगार्ड मुख्यालय पर 11 अप्रैल 2018 को राज्य स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस दौरान प्रदेश के सभी सभी मंडलों से होमगार्ड विभाग के खिलाडिय़ों ने भाग लिया। 12 अप्रैल को ग्राउंड पर रस्साकसी मैच था। लखनऊ में तैनात महिला बीओ काल्पनिक नाम (श्रीमती संगीता मिश्रा) ने अपने सीनियर अफसर (एसएसओ) सुनील कुमार के साथ अभद्रता की। इससे आहत श्री कुमार ने 16 अप्रैल को विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्य कुमार शुक्ला को पत्र लिखा। पत्र में लिखा है कि 12 अप्रैल को रस्साकसी मैच के दौरान लखनऊ में तैनात बीओ श्रीमती संगीता मिश्रा बार-बार मना करने के बाद भी ग्राउंड में गलत तरीके से अपने खिलाडिय़ों की मदद कर रही थीं। रस्साकसी के निर्धारित ग्राउंड पर पहले से ही ड्यूटी कर रहे अधिकारियों एवं खेल कूद कमेटी के अध्यक्ष द्वारा खिलाडिय़ों के अलावा खेल के दौरान किसी अन्य व्यक्ति का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित था। श्रीमती मिश्रा व अन्य को ड्यूटी पर तैनात जिला कमांडेंट, फतेहगढ़ शैलेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा माईक पर बार-बार बताया जा रहा था परन्तु श्रीमती मिश्रा ने एक भी बात नहीं मानी। उल्टे वहां मौजूद अधिकारी से बदतमीजी करते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया।
पत्र में सुनील कुमार ने लिखा है कि मेरे द्वारा यह भी समझाया गया कि खिलाडिय़ों के अलावा अन्य लोग रस्साकसी ग्राउंड में अनियमित तरीक से खिलाडिय़ों की मदद करेंगे तो खेलों मेें अनुशासन एवं निष्पक्षता नहीं रहेगा। बावजूद इसके श्रीमती मिश्रा

मेरी बात को समझने के बजाए मेरे ऊपर जोर-जोर से चिल्लाते हुए अपशब्दों का प्रयोग करने लगीं। इस पर मैंने उन्हें मंच एवं ग्राउंड से दूर चले जाने को कहा तो वे चिल्लाकर अमर्यादित आचरण एवं अनुशासनहीनता प्रदर्शित करती रहीं। इस घटना से मैं मानसिक रूप से आहत हूं और मेरी सामाजिक प्रतिष्ठïा प्रभावित हुई है। यह घटना वीआईपी के लिए बनाए गए मंच के समीप सुबह की पाली में हुई थी और उस वक्त डिप्टी कमांडेंट जनरल श्रीमती रजनी उपाध्याय,खेलकूद कमेटी के अध्यक्ष रंजीत सिंह एवं अन्य राजपत्रित अधिकारी मौजूद थें। पत्र में यह भी लिखा है कि जिस वक्त घटना हुई उसी समय बालीबाल ग्राउंड पर डिप्टी कमांडेंट जनरल डीआईजी एस के सिंह भी मौजूद थे। रस्साकसी ग्राउंड पर मनोज बघेल,सहायक कमांडेंट शैलेन्द्र प्रताप सिंह मौजूद थे। उक्त महिला बीओ ने एक दिन पूर्व 11 अप्रैल को कमांडेंट शैलेन्द्र प्रताप सिंह के साथ भी बदतमीजी की थी।

एसएसओ सुनील कुमार ने आखिर में लिखा है कि ग्राउंड पर अमर्यादित आचरण,अनुशासनहीनता एवं बदतमीजी करने वाली महिला बीओ श्रीमती संगीता मिश्रा के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। क्योंकि, उक्त घटना से मैं मानसिक रूप से आहत हुआ हूं तथा मेरी सामाजिक प्रतिष्ठïा भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। महिला बीओ द्वारा मंडल से आए खिलाड़ी जवान एवं उपस्थित मंडलों एवं जिलों के अधिकारियों व कर्मचारियों के सामने अमर्यादित आचरण एवं बदतमीजी की गई है। यदि इंसाफ नहीं मिला तो उसके खिलाफ मैं अनुसूचित जाति,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धारा 3 (1) (एक्स) तथा अन्य सुसंगत धाराओं के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करा सकते हैं।

बता दें कि घटना के बाद महिला बीओ श्रीमती संगीता मिश्रा ने डीजी सूर्य कुमार शुक्ला को पत्र लिखा था जिसमें उसने एसएसओ सुनील कुमार पर अभद्रता करने का गंभीर आरोप लगाया था। मुख्यालय पर तैनात एसएसओ की गिनती निहायत ही ईमानदार एवं कर्मठ अधिकारियों के रूप में की जाती है। अनुशासन से रत्ती भर समझौता न करने वाले इस अफसर के साथ रस्साकसी खेल के दौरान महिला बीओ ने जो किया,उस पर अफसरों को तत्काल उसके खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए थी। यदि ऐसा किया गया होता तो विभाग में संदेश जाता कि अफसरों के साथ बदतमीजी करने का अंजाम क्या होता है।
मेरा सवाल डीआईजी एस. के. सिंह से है, जब वे उस समय बालीबाल ग्राउंड पर मौजूद थें तो उन्होंने तत्काल महिला बीओ श्रीमती संगीता मिश्रा को निलंबित क्यों नहीं किया? जब डीजी ने उन्हें जांच सौंपी तो उन्होंने अफसरों का बयान लेने के बाद तत्काल अपनी जांच रिपोर्ट डीजी को क्यों नहीं सौंपी? आखिर वे महिला बीओ पर इतने मेहरबानी क्यों बरत रहे हैं? डीआईजी साहेब, कल को यदि कोई जूनियर कर्मचारी सैंकड़ों जवानों के सामने आपकी इसी तरह से बेइज्जती करे और जांच किसी सीनियर को मिले और वो कार्रवाई ना करे तो आपको कैसा लगेगा?

बताया जाता है कि डीआईजी एस. के. सिंह ने एसएसओ सुनील कुमार ,कमांडेंट, फतेहगढ़ शैलेन्द्र प्रताप सिंह एवं महिला बीओ श्रीमती संगीता मिश्रा से एक माह पूर्व ही बयान ले चुके हैं लेकिन अभी तक उन्होंने डीजी को अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी। महिला बीओ ने अपने बयान में डीआईजी से अपने किए पर शर्मिंदा जताते हुए इसके पीछे सीटीआई पर तैनात मंडलीय कमांडेंट संजीव शुक्ला को दोषी बताया है। उसने बयान में कहा है कि उसने संजीव शुक्ला के कहने पर एसएसओ सुनील कुमार पर अभद्रता का आरोप लगाया। बात साफ है। महिला बीओ ने अपने पत्र में एसएसओ सुनील कुमार पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं उसके पीछे गहरी साजिश है। पूरा खेल सीटीआई के मंडलीय कमांडेंट संजीव शुक्ला के इशारों पर खेला गया ताकि सुनील कुमार की साख विभाग में पूरी तरह से खराब हो जाए। खैर, ये जांच का विषय है और महिला बीओ ने अपने बयान में जिस अफसर का नाम लिया है तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं इसका फैसला तो उनके बड़े भाई डीजी सूर्य कुमार शुक्ला को करना है। देखना है कि इस फैसले में निष्पक्षता पर भाई प्रेम भारी पड़ता है या नहीं…।

इस बारे में अनौपचारिक रूप से बातचीत के दौरान एसएसओ सुनील कुमार ने बताया था कि इस घटना से मैं पूरी तरह से आहत हूं। यदि विभागाध्यक्ष महिला बीओ के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेंगे तो मैं महिला के खिलाफ अनुसूचित जाति,जनजाति अत्याचार अधिनियम 1989 के तहत कार्रवाई करूंगा। उन्होंने यह भी बताया था कि मेरी ईमानदार छवि को धूमिल करने की साजिश रची गई है।

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